कौशिक नाग कोलकाता
भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट कर पश्चिम बंगाल पुलिस पर शक्ति के दुरुपयोग का गंभीर आरोप लगाया है. उन्होंने लिखा है कि बंगाल पुलिस ने बिना किसी सूचना के पत्रकार सुरजीत दासगुप्ता को सुबह सात बजे उनके नोएडा स्थित आवास से गिरफ्तार किया है. सुरजीत पर आरोप है कि वो तृणमूल कांग्रेस की एक सांसद और उनके प्रेमी के बीच हुई चैट को कथित तौर पर सार्वजनिक करने का काम किया है. पुलिस का तर्क है कि चैट “फर्जी” है. अमित मालवीय ने कहा है कि इस मामले में पत्रकार की गिरफ्तार नहीं हो सकती है, क्योंकि चैट असली थी या नकली, इसका फैसला कौन करेगा? निश्चित रूप से कृष्णानगर पुलिस तो नहीं करेगी. अमित मालवीय ने कहा है कि यदि दो व्यक्तियों के बीच की निजी चैट सार्वजनिक हो जाती है, तो तर्कसंगत रूप से यह कहा जा सकता है कि लीक का स्रोत केवल इसमें शामिल दो पक्षों में से एक ही हो सकता है, या तो प्रेषक या प्राप्तकर्ता. फिर बंगाल की पुलिस मशीनरी को उन लोगों के खिलाफ हथियार के रूप में क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है, जो केवल सार्वजनिक क्षेत्र में पहले से प्रसारित हो रही बातों को सामने ला रहे हैं. उन व्यक्तियों को क्यों निशाना बनाया जाए जो असल में केवल वही बातें साझा कर रहे हैं, जो दूसरे लोग डिस्कस कर रहे हैं. कृष्णानगर के पुलिस अधीक्षक को यह याद रखना चाहिए कि उनका कर्तव्य पश्चिम बंगाल की जनता की सेवा करना है, न कि किसी पथभ्रष्ट सांसद की मनमानी और संवेदनशीलता को संतुष्ट करना. अमित मालवीय अपने पोस्ट में आगे लिखते हैं- भारत का संविधान स्पष्ट करता है कि प्रत्येक नागरिक को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि उसका दोष सिद्ध न हो जाए. फिर भी, इस मामले में, पश्चिम बंगाल पुलिस ने संवैधानिक सुरक्षा उपायों और उचित प्रक्रिया को नजरअंदाज कर दिया है. सात साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए कानून में पेशी के लिए अनिवार्य नोटिस का प्रावधान है. पश्चिम बंगाल पुलिस, इस बात से पूरी तरह अवगत होते हुए कि सुरजीत दासगुप्ता उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर रहते हैं, ने यात्रा की व्यवस्था करने के लिए बुनियादी समय दिए बिना ही 24 घंटे के भीतर पेश होने की मांग करते हुए एक नोटिस जारी किया. इसके तुरंत बाद वारंट प्राप्त करने के लिए जल्दबाजी में कदम उठाए गए. अमित मालवीय कहते हैं- अगर पश्चिम बंगाल पुलिस बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जांच में भी उतनी ही तत्परता दिखाए, तो आज बंगाल की बेटियां कहीं अधिक सुरक्षित होंगी. दुख की बात है कि ऐसी कार्यकुशलता केवल उन मामलों तक ही सीमित दिखती है, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील होते हैं और जिनमें प्रभावशाली व्यक्ति शामिल होते हैं. यह प्रकरण दंड प्रक्रिया संहिता का घोर उपहास है. यह ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के एक ऐसे पुलिस राज्य में परिवर्तित होने को दर्शाता है, जहां असहमति व्यक्त करना और सत्ताधारियों को शर्मिंदा करना अपराध माना जाता है. इस घटना से उठने वाले बड़े सवाल भी उतने ही चिंताजनक हैं.