कटनी – शासकीय महाविद्यालय बरही मे संचालित इको क्लब एवं राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई द्वारा प्राचार्य डॉ. आर. के. त्रिपाठी के मार्गदर्शन एवं प्रभारी कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अरविंद सिंह के नेतृत्व में होली के रंग प्रकृति के संग विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में डॉ. अरविंद सिंह ने बताया कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य होली के पावन पर्व एवं अन्य सामाजिक अवसरों पर बाजार में उपलब्ध खतरनाक रसायनों से बने हानिकारक रंगों से परहेज करना तथा प्राकृतिक पदार्थों से बने रंगों के उपयोग करने के लिए सामाज को जागरूक एवं प्रेरित करना है। कार्यक्रम में विद्यार्थियों को प्राकृतिक विभिन्न प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग कर अलग-अलग रंगों के बनने की पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी गई। जैसे हरे रंग के लिए पालक, करी पत्ता और मेंहदी के पत्ते, पीले रंग के लिए कच्ची हल्दी एवं गेंदा के फूल, नीले रंग के लिए जैस्मिन, अपराजिता के फूल, नारंगी रंग के लिए गेंदा के फूल, लाल रंग के लिए टेसू के फूलों तथा लाल और गुलाबी रंग के लिए चुकंदर के रस का प्रयोग किया जाता है। सभी सामग्रियों को अच्छी तरह सुखाने के बाद बारीक पीसकर सुरक्षित तरीके से गुलाल एवं रंग तैयार किया जाता है। साथ ही गुलाब का इत्र, चंदन आदि मिलाकर रंगों को खुशबूदार भी बनाया जा सकता है।
साथ ही डॉ. अरविन्द सिंह ने कहा कि प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर हम न केवल अपनी संस्कृति और सभ्यता का संरक्षण करेंगे, बल्कि स्वस्थ समाज एवं स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में भी सहभागी बनेगें।
डॉ. सुनीता सिंह ने कहां कि प्राकृतिक रंगों का उपयोग न सिर्फ हमें शारीरिक नुकसान से बचाता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार होते है। जबकि केमिकल युक्त रंग नदियों के जल, मृदा एवं पर्यावरण को भी प्रदूषित करते हैं। इसलिए लोगों को इस बात को भलीभांति समझना होगा कि रासायनिक रंग कभी प्राकृतिक रंगों का विकल्प नहीं हो सकते है। डॉ. रामानुज पटेल ने बताया कि पारंपरिक तरीकों से बनाए गए प्राकृतिक रंगों से न केवल स्वस्थ ठीक रहता है बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी अनुकूल होते है। साथ ही महिला स्वसहायता समूहों के लिए आमदनी का अच्छा स्रोत भी बन रहे है।
जबकि डॉ. के. के. विश्वकर्मा ने कहां कि होली रंगों का त्योहार है जिसमें एक-दूसरे को रंग लगाकर सफलता और खुशहाली की शुभकामनाएं दी जाती है, लेकिन इस दौरान की जाने वाली थोड़ी-सी जिद एवं जोर-जबरदस्ती या लापरवाही किसी के शरीर या जान के लिए मुसीबत भी बन सकती है। वहीं डॉ. रश्मि त्रिपाठी ने रासायनिक रंगों के उपयोग से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों जैसे त्वचा रोग, आंखों में जलन, अंधापन, कैंसर जैसे गंभीर समस्याओं से विद्यार्थियों को अवगत कराया साथ ही बताया कि इन खतरनाक रसायनों के उपयोग से पानी और मिट्टी भी प्रदूषित होते हैं।
अंत में प्राचार्य प्रो. आर. के. त्रिपाठी ने कहां कि बाजार में मिलावटी एवं केमिकलयुक्त रंग काफी सस्ते दर पर बेचें जाते है। जिनसे चर्म रोग सहित कई बड़ी एवं घातक बीमारियां हो सकती हैं। साथ ही सभी को सतर्क रहते हुए सुरक्षित होली मनाने के उपायों को अपनाने कि अपील की एवं प्राकृतिक रंगों से होली खेलने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन प्रियंका तोमर द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्राचार्य डॉ. आर. के. त्रिपाठी, प्रभारी कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अरविन्द सिंह, डॉ. एस. एस. धुर्वे, डॉ. रश्मि त्रिपाठी, डॉ. सुनीता सिंह, डॉ. के. के. विश्वकर्मा, डॉ. रामानुज पटेल, मनोज चौधरी, सौरभ तिवारी, अब्दुल बारी, सुनील कुमार कहार, डॉ. राकेश दुबे, डॉ. के. के. निगम, डॉ. रूपा शर्मा, डॉ. अरविन्द शुक्ला, अनीता सिंह, पवन दुबे, कैश अंसारी, डॉ कृष्णपाल सिंह, सौरभ सिंह, रावेंद्र साकेत, सोनम पाण्डे, पुष्पलता विश्वकर्मा, संतोषी तिवारी, डॉ. अरुण तिवारी, डॉ. चंद्रभान विश्वकर्मा, शंकर सिंह, महिमा तिवारी, आशीष तिवारी, अजय सेन, राजेश्वरी मिश्रा, गणेश प्रजापति तथा स्टॉफ के अन्य सदस्य, रासेयो स्वयंसेवको एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।
इंडियन टीवी न्यूज़ कैमोर से श्याम गुप्ता की रिपोर्ट