रिपोर्टर: ज़ाकिर ज़ंकार : आहवा, डांग
गुजरात राज्य की स्थापना वर्ष 1960 में हुई, जब गुजरात और महाराष्ट्र अलग-अलग राज्य बने। उस समय डांग जिले को गुजरात में शामिल किया जाए या महाराष्ट्र में, इस मुद्दे पर बड़ा संघर्ष खड़ा हुआ था। इस ऐतिहासिक लड़ाई में डांग स्वराज आश्रम संस्था ने अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई थी।
डांग स्वराज आश्रम द्वारा वर्ष 1948 से ही डांग जिले में शिक्षा, सेवा और जागरूकता के कार्य शुरू किए गए थे। उस समय डांग क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा और सुविधाओं से वंचित था। इसके बावजूद अनेक कठिनाइयों और बाधाओं के बीच संस्था ने शिक्षा की ज्योति प्रज्वलित की।
इस कार्य में सर्वश्री रामजीभाई पटेल, जुगतराम दवे, छोटुभाई नायक, घेलुभाई नायक, गांडाभाई पटेल, धीरुभाई नायक, गुणवंतभाई पारिख सहित कई नामी-अनामी सेवाभावी कार्यकर्ताओं का अमूल्य योगदान रहा। अनेक लोगों ने अपने युवावस्था के वर्ष डांग के आदिवासी समाज के शिक्षा और विकास के लिए समर्पित कर दिए।
जब डांग के भविष्य को लेकर चर्चाएँ तेज हुईं, तब सभाएँ, रैलियाँ और प्रस्तुतियाँ मुंबई से लेकर दिल्ली तक पहुँचीं। अंततः जब डांग के लोगों की राय को महत्व दिया गया, तब स्थानीय लोगों ने स्पष्ट कहा कि गुजराती समाज के सेवकों ने हमारे बीच रहकर शिक्षा, जागरूकता और आवश्यक सेवाएँ प्रदान की हैं, इसलिए हम गुजरात के साथ रहना चाहते हैं।
डांग के लोगों के इस स्पष्ट मत और वर्षों तक चले निःस्वार्थ सेवाकार्यों के परिणामस्वरूप आज सापुतारा सहित पूरा डांग जिला गुजरात का गौरवशाली हिस्सा है।
डांग स्वराज आश्रम के कार्यकर्ताओं में छोटुभाई नायक (1948–1987), धीरुभाई (1949–2005), घेलुभाई नायक (दीर्घकालीन सेवा) तथा गांडाकाका (1950–2023) जैसे महान व्यक्तित्वों का योगदान अविस्मरणीय माना जाता है।
डांग जिले में शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य और पर्यटन सहित अनेक क्षेत्रों में विकास दिखाई देता है। इस विकास की नींव वर्षों पहले किए गए इस सेवा-यज्ञ और संघर्ष में निहित है।
डांग को गुजरात में जोड़ने का यह महान कार्य सामूहिक प्रयास, टीम वर्क और निःस्वार्थ कर्मयोग का जीवंत उदाहरण है।