रिपोर्टर संतन दास मानिकपुरी
छत्तीसगढ़ के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में अपना नाम शुमार करते वनदेवी माता घटारानी का दैवीय स्थल गरियाबंद जिला के छुरा और फिंगेश्वर प्रखंड के मध्य घने जंगल में बसा है। क्षेत्रवासी इस स्थान को धसकुल पुकारते है।यह स्थल राजधानी रायपुर से छुरा मार्ग पर महज 75 किमी की दूरी पर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। जनश्रुति है माता घटारानी भूले को राह दिखाने वाली है। नवरात्र के दोनों महापर्व पर यहां देश_ विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन को आते हैं। लेकिन माता घटारानी की महिमा से अनजान है। आज पहली बार माता की सच्ची कहानी जनमानस को सादर समर्पित हैं!
आधुनिकता के दौर में लोग जहां गायों को गरू कहते हैं वहीं अंचल में प्रत्येक घर गौपालन में विशेष रुचि रखते थे। गाय ही जीवन का आधार हुआ करता था। लगभग तीन दशक पूर्व सन् 1997 में एक गरीब परिवार गौपालन में विशेष रुचि रखते थे। उनके घर पर दुग्ध से बने उत्पाद दही, मही, घी आदि की कमी नहीं थी। जरूरत के हिसाब से सेवन, पूजन के लिए उपलब्ध हो जाती। अपनी मां_ बाप की तरह बच्चे भी गायों से बहुत प्रेम करते थे। उनके बछड़े के साथ खेलना बच्चों का दिनचर्या था। जब भी कोई गाय बछड़ा अथवा बछिया को जन्म देते वार के अनुकूल नामकरण कर देते। बच्चों की माताजी गायों की देखभाल अपने बच्चों की तरह करती। जेठ महीने का समापन और आषाढ़ का शुभागमन था एक दिन गर्भिणी गाय रजनी जंगल से चरकर घर नहीं आई। चरवाहे को पूछी तो जंगल में छुटने की सूचना दी। वह बार बार कोठा को जाकर देखती अपने पति को बोलती अभी तक नहीं आई? पति सांत्वना देती जंगल से उतरते खेत खार के आसपास होगी, आ जाएगी। जानवर अपनी राह नहीं भटकते। यदि कहीं छूटी होगी तो दूसरे बरदी(मवेशियों का झुंड) के साथ जरूर आ जाएगी, चिंता मत कर। इधर मां को नींद नहीं आ रही थी मानो उनका संतान खो चुका हो, चिंता और भय से उनका रोम_रोम कंपित हो रही थी, खाने को भोजन निकालती तो खा नहीं पाती। रजनी गर्भिणी थी तो उनकी चिंता दुगुनी हो जाती। भय इस बात की थी जहां वह चरने जाती भयंकर जंगल था, आए दिन जंगली जानवर मवेशियों का शिकार कर देते थे। अंचल में बुंदी बाघ(तेंदुआ/चीता) का भी आतंक था। उनको चिंता सताने लगी कि कहीं जानवरों ने रजनी को खा तो नहीं डाला। इस व्याकुल में वह रात भर सो नहीं पाई। सुबह होती माताजी अपने पति को खोजने भेजती।हफ्ते भर बीत गए पति ने अंदाजा लगा लिया निश्चित ही रजनी को बुंदी बाघ ने खा लिया होगा।लेकिन मां की ममता नहीं मान रही थी, उन्हें विश्वास था कि रजनी जिंदा है आज नहीं तो कल अवश्य आयेगीं। लेकिन ऐसा बहुत कम बार हुआ कि जंगल में मवेशी छूट जाए और वह घर वापिस आ जाए। जब सारे विकल्प बंद हो गए तो वह अपने मन को ढांढस बंधाते एक जोड़ा नारियल अपने पति को देते चेष्टापूर्वक आग्रह की, आप एक बार धसकुल (धसकुड़) चले जाते?अब माता घटारानी ही रजनी को राह दिखाएगी उन्हें विश्वास था कि वह राह भटक गई है। धसकुल क्षेत्र का जंगल सघन और खूंखार जानवरों तेंदुआ, लकड़बग्घा, भालू, वराह, जंगली कुत्ता आदि का विचरण क्षेत्र था। अकेले जंगल में प्रवेश करने की हिम्मत कोई नहीं करता। शाम होते ही घरों के किवाड़ बंद हो जाते। जंगली जानवरों का खतरा सताने लगता। ऐसे में पति को अकेले जंगल में भेजना भी एक कठिन निर्णय था। माता घटारानी का पवित्र स्थान ग्राम से 5 से 7 किमी की दूरी के अंदर पहाड़ी पर बसा है। मार्ग दुर्गम विशाल साजा, महुआ, तेंदू, धोबिन, भीरहा आदि के पेंड़ कर्रा, कुर्रू, मोकाइया की कटीली झाड़ियां, बेशरम का झुंड निर्जन वन सर_सर करती हवा, पति कंधे पर टंगिया, तुमड़ी में पानी और दो नारियल की पोटली लेकर सुबह 8 बजे घर से निकला। पत्नी की व्याकुलता दोहरी हो गई एक तरफ गौमाता के गुम का दुःख तो दूसरी ओर पति का दुर्गम निर्जन वन में जाना! अब उनके पास एक ही विकल्प था माता की भक्ति करना और दोनों की सकुशल वापसी की प्रतिक्षा करना। तभी एक चमत्कार हुआ उधर पति माता के मंदिर ही पहुंचा हो और इधर रजनी अचानक कोठा पर आ गई, उनके पैर घुटने तक पानी से भीगी हुई थी मानो वह किसी नदी नाला को पार कर आई हो। पत्नी की आंखें चमक गई कुछ पल उन्हें विश्वास नहीं हो रही थी यह कैसे संभव है! मां ने रजनी को पुचकारा, तुरंत कोढ़ा, भूसा, पसिया पानी की व्यवस्था की। गले लगाकर बार बार रोती, पूछती इतने दिन तक कहां चली गई थी, घर की याद नहीं आई, कैसे थी क्या खाती थी? अब उन्होंने स्वच्छ मन से मां घटारानी को हृदय से धन्यवाद ज्ञापित की और वचन दी मां! मैं सपरिवार दर्शन लाभ के लिए अवश्य आउंगीं। इधर कुछ देर बाद पति भी आया और रजनी को अपने बीच पाकर चकित रह गया! वास्तव में यह चमत्कार ही था जिस जंगल में मवेशी एक दिन छूट जाए तो दूसरे दिन उनका अस्थि_पिंजर ही मिलता है। उन्होनें मां घटारानी की महिमा को जाना और सेवा का संकल्प लिया। वचनबद्ध माताजी ने माता के मंदिर को कभी देखी नहीं थी फिर भी वे अपने बच्चों और पड़ोसियों के साथ शारदीय नवरात्र के पर्व पर दर्शन हेतु निकले। पगडंडी रास्ते पर डोंगरी को चढ़ते, घूमते, पत्थरों के ढेर में पत्थर(कुढ़ी पत्थर) डालते, पत्ते के ढेर में पत्ते डालते माता घटारानी का जयकारा करते आमला के फलों को बिनते_बिनते पहाड़ी की चोटी पर पहुंचे। जहां पंछियों का कलरव,मोर की म्याऊं, कल_कल करती झरने, झरनों से ऊपर उठती नीली जलराशि की फुहार ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। जैसे_तैसे मां के धाम तो पहुंचे मगर माता का दर्शन करना सबके बस की बात नहीं। उनके स्थान पर लताओं को फांदते , केवास के फलों से बचते ऊपर चढ़कर 15 फूट नीचे लताओं के सहारे झूलते चट्टानों के नीचे आना था। जहां एक बार में एक से दो श्रद्धालु के लिए ही स्थान था जिस कंदरा पर माता घटारानी विराजमान थी। श्रद्धालु अपना भेंट पान,सुपारी, नारियल नीचे जाने वाले को देकर मन्नत मान लेते थे। किंवदंती है कि माता घटारानी भूले को राह दिखाने वाली जगदम्बा स्वरूपा!है जो सच्चे हृदय से दर्शन लाभ लेने वालों की मन्नतें अवश्य पूरी करती हैं। यहां का वातावरण इतना सुरम्य हैं कि आगंतुक श्रद्धालु को वापिस होने का मन ही नहीं करता। दिन कैसे ढल जाता है ज्ञात ही नहीं होता। सभी ने झरने का निर्मल मीठा जल पिया। आमला की मिठास ने जल में अमृत घोल दिया। सायंकाल से पूर्व जंगली जानवरों के निकलने से पूर्व श्रद्धालुजन थोड़ा सुस्ताकर घर की ओर प्रस्थान करते हैं। प्रकृति की नैसर्गिक वातावरण को बार_बार संजोकर स्वर्ग सा आनंद लेते हैं।
।।जय माता दी।।