21 साल बाद भी नहीं बनी लोहगरा रिफाइनरी ,सांसद ने उठाया सदन में मुद्दा
बारा तहसील में तेल शोधक कारखाना के लिए अधिग्रहित की गई थी जमीन
छला गया किसान , नहीं शुरू हुआ काम
राज्यसभा सांसद कुंवर रेवती रमण सिंह ने उठाया मामला
बारा तहसील के 8 से अधिक गांवों की जमीनी सन 1999-2000 में तेल शोधक कारखाना के लिए अधिग्रहित की गई थी जिसमें 21 साल बाद भी ना तो कोई काम शुरू हो पाया है ना तो किसानों का मुआवजा ही मिल पाया है जिससे बार-बार बारा का किसान छला गया है। किसानों ने उनकी जमीनों पर तेल शोधक कारखाना न बनने की स्थिति में अपनी जमीन वापस लौटाए जाने की मांग की है।
बता दें कि 21 साल पहले बारा तहसील के लऊंद खुर्द, मदनपुर , दुबहा, भोंडी, कपारी , कपसो अंतरी ,शिवराजपुर, खान सेमरा आदि गांवों की लगभग 2000 हेक्टेयर से अधिक जमीनों का अधिग्रहण हुआ था। बताया गया कि विशेष भूमि अध्यपित कार्यालय द्वारा किसानों को ₹3500 प्रति बीघा के हिसाब से पहली किस्त दी गई थी। तथा दूसरी किस्त लगभग ₹12000 प्रति बीघा के हिसाब से दी गई थी। जमीन की कीमत से असंतुष्ट कुछ किसानों ने तो आज तक एक भी पैसा मुआवजे के रूप में नहीं लिया है ,वहीं जिन किसानों ने जमीनों का मुआवजा लिया है वह आपत्ति के साथ लिए हैं।
गांव के 70% लोगों को 80% मुआवजे का भुगतान तो हो चुका है लेकिन 21 साल बाद भी रिफाइनरी के न बनने से क्षेत्र के लोगों में मायूसी छाई हुई है।
किसानों की जमीन भारत पेट्रोलियम के नाम चढ़ गई हैं जिससे उस भूमि पर से किसानों को बेदखल कर दिया गया है । लेकिन नियम को देखा जाए तो इतने वर्षों बाद भी यदि रिफाइनरी नहीं बनी तो किसानों को उनकी जमीन वापस लौटाने चाहिए। और जिन किसानों ने मुआवजा नहीं लिया है उनको नियमानुसार ब्याज सहित जोड़कर मुआवजा दिया जाए। लेकिन इन सब मामले में अभी तक की सभी सरकारी उदासीनता ही दिखा रही है।
लगभग 20% लोगों ने कम मुआवजा होने के कारण नहीं ली एक भी रकम
कुछ किसानों ने जहां ओने पौने दाम पर मुआवजा ले लिया कि कंपनी बनेगी तो हम लोगों को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र का विकास होगा ।वहीं कुछ लोगों ने जमीन का मुआवजा नहीं लिया और उनका मामला भूमि अध्यापित कार्यालय सहित कोर्ट में भी चल रहा है।
सभी गांवों का अलग-अलग निर्धारित किया गया था सर्किल रेट
बारा तहसील के अंतर्गत ली गई रिफाइनरी की जमीनों का अलग-अलग गांवों में अलग-अलग सर्किल रेट मनमाने तरीके से निश्चित किया गया था जिससे आज तक किसान असंतुष्ट दिखाई पड़ रहे हैं। बताया गया कि कपारी व भोंडी का सर्किल रेट प्रति बीघा 18000, लाऊंड खुर्द का 28000, दूबहा का 22000 रखा गया था।
नहीं हुआ परिसंपत्तियों का निवारण
तेल शोधक कारखाना के लिए ली गई जमीनों के अलावा बहुत सारे ऐसे मजरे हैं जो अधिग्रहण के बाद इस कंपनी में आ गए थे। बताया गया कि अभी तक मकान पेड़ आदि का कोई भी मुआवजा नहीं दिया गया। जबकि कपारी गांव के मजरा अमहा के लगभग 35 से अधिक घर रिफाइनरी की अधिग्रहीत जमीन के दायरे में आ गए हैं लेकिन न तो पेड़ का न तो घर का मुआवजा दिया गया जिससे किसान मायूस हैं।
पुनर्वास नीति के तहत नियमों की हुई अनदेखी।
रिफाइनरी के लिए ली गई जमीनों में पुनर्वास नीति की जमकर धज्जियां उड़ाई गई।
भूमिहीन, लघु सीमांत, और सीमांत किसानों को अधिग्रहण कानून के तहत मिलने वाली सुविधा का ध्यान नहीं रखा गया , जबकि पावर प्लांट के लिए ली गई जमीनों में लघु, सीमांत, भूमिहीन और कृषक मजदूरों को नियमानुसार मुआवजा दिया गया है।
बार-बार छला गया बारा का किसान
बारा क्षेत्र का किसान बार-बार छला गया । 1999 – 2000 में तेल शोधक कारखाना के लिए लगभग 1207 किसानों की जमीन पहले ही हाथ से चली गई थी जो कुछ बची थी रही सही कसर 2007 में ताप विद्युत गृह निर्माण के लिए अधिग्रहित कर ली गई। तत्कालीन सरकार ने सन 2007 में 817 किसानों की औने पौने दाम में पावर प्लांट के लिए जमीनों का अधिग्रहण करा दिया लेकिन रिफायनरी की तुलना में पावर प्लांट का मुआवजा अधिक था। 2007 में अधिग्रहीत जमीन पर पावर प्लांट बनकर तैयार है और 1980 मेगा वाट का विद्युत का उत्पादन भी चालू है लेकिन 21 सालों से रिफाइनरी के लिए ली गई जमीनों पर ना तो आज तक काम प्रारंभ हो सका, ना तो उनकी जमीनें किसानों को लौटाई जा सकीं। जिससे क्षेत्र के किसान मायूस दिखाई पड़ते हैं। लोगों ने सरकार से मांग की है कि उनकी जमीनों को उन्हें लौटा दिया जाए ताकि वह उस पर खेती कर के 2 जून की रोटी का जुगाड़ कर सकें।
पवन कुमार पाल
ब्यूरो चीफ प्रयागराज
इंडियन टीवी न्यूज़
