सड़क परिवहन मंत्रालय ने बड़ा फैसला लिया है। उसने सोमवार को ‘केंद्रीय मोटर वाहन नियमों’ में बदलाव की अधिसूचना जारी की है। इसके तहत अब ऐसे ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ वाहनों को अनुमति दी गई है।
सरकार का मानना है कि पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटानी है. देश में बनने वाले फ्यूल का इस्तेमाल बढ़ाना है. किसानों को नई मांग से जोड़ना है. लेकिन सवाल यह है कि क्या फ्यूल बदलने से पूरी तस्वीर बदल जाएगी।
नीति आयोग की इथेनॉल ब्लेंडिंग पर रिपोर्ट के आधार पर, गन्ने से बनने वाले एक लीटर इथेनॉल का कृषि स्तर पर वॉटर फुटप्रिंट करीब 2,860 से 3,000 लीटर तक हो सकता है. धान से बनने वाले इथेनॉल के मामले में यह आंकड़ा 10,000 लीटर से भी ज्यादा हो सकता है. मक्के से इथेनॉल बनाने में भी पानी की जरूरत पड़ती है. ये आंकड़े मुख्य रूप से फसल उगाने में इस्तेमाल होने वाले पानी को दिखाते हैं. इन्हें सिर्फ फैक्ट्री में खर्च होने वाले पानी के रूप में समझना गलत होगा।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्री कितने लीटर पानी खर्च करती है. सवाल यह भी है कि उस फसल को उगाने में कितना पानी लगा, जो बाद में फ्यूल बनकर गाड़ी के टैंक में पहुंचा. भारत में पानी की कमी पहले से एक बड़ी चुनौती है. कई इलाकों में भूजल का स्तर गिर रहा है. किसान बारिश और सिंचाई के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे में अगर इथेनॉल की मांग बढ़ने पर गन्ने और अनाज की खेती का रकबा बढ़ता है, तो पानी पर दबाव भी बढ़ सकता है।
सामान्य पेट्रोल या E20 फ्यूल से चलने वाली गाड़ियों में सीधे E85 या E100 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. E20 में अधिकतम 20 फीसदी इथेनॉल और बाकी पेट्रोल होता है. वहीं, E20 से ज्यादा और E100 तक इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल का इस्तेमाल केवल उन्हीं वाहनों में किया जा सकेगा, जिन्हें इसके लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया हो।
जयपुर सिटी
ब्यूरो चीफ
स्वपनदीप जोशी

