मंडल ब्यूरो चीफ चंद्रजीत सिंह की रिपोर्ट
सोनभद्र/ ज़िले से निकली यह तस्वीर स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जर हालत और शासन-प्रशासन की नाकामी को बेनक़ाब करती है। राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत देश को 2025 तक टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन हक़ीक़त इसके ठीक उलट है। जिला सोनभद्र में रोज़ाना सात नए मरीज सामने आ रहे हैं। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि पिछले साढ़े छह साल में 17,966 टीबी मरीज मिले, जिनमें से सबसे अधिक पीड़ित औद्योगिक क्षेत्रों डाला और चोपन के क्रशर प्लांट इलाकों से मिले। यह स्थिति बताती है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही किस कदर घातक साबित हो रही है। विभाग दावा करता है कि लगातार अभियान चलाकर मरीजों की जांच और इलाज हो रहा है, लेकिन जमीनी हक़ीक़त कुछ और कहती है। अस्पतालों की संख्या सीमित, डॉक्टरों की कमी और दवाओं की अनियमित सप्लाई के चलते गरीब और मज़दूर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है
दोषियों की पहचान स्पष्ट है
खनन और क्रशर उद्योगों से निकलने वाली धूल का असर स्थानीय लोगों के फेफड़ों पर पड़ता है, लेकिन इन उद्योगों पर नकेल कसने में प्रशासन नाकाम रहा है
स्वास्थ्य विभाग ने गांव-गांव तक जांच का दायरा बढ़ाने के नाम पर अभियान चलाया, परंतु जांच किट, मोबाइल वैन और स्वास्थ्यकर्मी समय से उपलब्ध नहीं कराए गएसरकारी अस्पतालों की दशा यह है कि मरीजों को प्राइवेट दवाखानों की शरण लेनी पड़ती है। आंकड़े बताते हैं कि 2019 में 2191, 2020 में 2175, 2021 में 2715, 2022 में 2835, 2023 में 2791, 2024 में 4268 और 2025 में अब तक 3166 मरीज सामने आ चुके हैं। यह डरावना सच है कि हर साल मरीजों की संख्या बढ़ रही है। यह केवल बीमारी नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी और उद्योगपतियों की लूट का प्रमाण है। और भी शर्मनाक यह कि 45 मरीज इलाज बीच में ही छोड़ गए। कारण स्पष्ट है- समुचित निगरानी और काउंसलिंग का अभाव। सरकार ने मरीजों के खाते में महीने-दर- महीने पोषाहार के लिए पैसा भेजने की व्यवस्था की, लेकिन जब तक ज़मीनी निगरानी नहीं होगी, तब तक यह योजना भी महज़ काग़ज़ी साबित होगी। आज ज़रूरत है कि जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को कठघरे में खड़ा किया जाए। केवल आंकड़े गिनाकर वाहवाही लूटने की बजाय, अगर सचमुच टीबी मुक्त भारत का सपना पूरा करना है, तो सोनभद्र जैसे जिलों में युद्धस्तर पर चिकित्सा ढांचा खड़ा करना होगा। वरना यह बीमारी केवल मरीजों को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को निगल जाएगी