रिपोर्ट अजय सिंह तोमर
पोरसा|नगर में आज जैन समाज द्वारा वेदी प्रतिष्ठा का वार्षिक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर चंद्राप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में विविध धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ, जिसमें समाज के सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। पूरा वातावरण “णमो अरिहंताणं” और “जय जिनेंद्र” के उद्घोष से गुंजायमान रहा।
शांतिनाथ विधान और महायज्ञ का आयोजन
महोत्सव के अंतर्गत प्रातःकाल शांतिनाथ विधान का भव्य आयोजन किया गया। जैन धर्म में विधान को आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। श्रद्धालुओं ने विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चन कर विश्व शांति, अहिंसा और समस्त जीवों के कल्याण की कामना की।
इसके पश्चात महायज्ञ का आयोजन हुआ, जिसमें वैदिक मंत्रोच्चार और जैन आगम परंपरा के अनुसार आहुतियां दी गईं। वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो उठा।
प्रभात फेरी से हुआ शुभारंभ
सुबह प्रभात फेरी निकाली गई, जिसमें समाज के महिला-पुरुष, युवा और बच्चे हाथों में ध्वज एवं धार्मिक प्रतीक लिए भक्ति गीत गाते हुए नगर भ्रमण पर निकले। प्रभात फेरी का उद्देश्य जन-जन तक धर्म का संदेश पहुंचाना और अहिंसा, सत्य एवं संयम के सिद्धांतों का प्रचार करना रहा।
पाठशाला का दसवां वार्षिक महोत्सव
इस अवसर पर जैन पाठशाला का दसवां वार्षिक महोत्सव भी मनाया गया। विद्यार्थियों ने धार्मिक प्रश्नोत्तरी, स्तवन एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से जैन सिद्धांतों की सुंदर प्रस्तुति दी। आचार्यों एवं समाजजनों ने बच्चों को धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहने की प्रेरणा दी।
भव्य चल समारोह
दोपहर बाद भगवान चंद्राप्रभु की प्रतिमा को सुसज्जित रथ पर विराजित कर विशाल चल समारोह निकाला गया। यह शोभायात्रा चंद्र प्रभु दिगंबर जैन मंदिर से प्रारंभ होकर सब्जी मंडी रोड, अटेर रोड, भिंड रोड स्थित महावीर चैत्यालय, अंबा रोड, आदिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर तथा नसिया जी मंदिर से होते हुए पुनः मंदिर परिसर में संपन्न हुआ।
बैंड-बाजों और भजनों की मधुर धुनों के साथ निकले इस चल समारोह में जैन समाज के लोग श्रद्धा और उल्लास के साथ थिरकते हुए चल रहे थे। जगह-जगह समाज बंधुओं एवं नागरिकों द्वारा पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का स्वागत किया गया।
वेदी प्रतिष्ठा का आध्यात्मिक महत्व
जैन धर्म में वेदी प्रतिष्ठा का विशेष महत्व है। वेदी वह पवित्र स्थान है जहां तीर्थंकर भगवान की प्रतिमा विराजमान होती है। इसकी स्थापना धर्म, संयम और साधना की निरंतरता का प्रतीक मानी जाती है। वेदी प्रतिष्ठा का वार्षिकोत्सव भक्तों को यह स्मरण कराता है कि आत्मा की शुद्धि, तप, त्याग और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
भगवान चंद्रप्रभु आठवें तीर्थंकर हैं, जिन्होंने अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम का संदेश दिया। उनका जीवन मानवता को सत्य और तपस्या के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
शांति धारा के साथ कार्यक्रम का समापन
चल समारोह के समापन पर मंदिर में विधिवत शांति धारा कराई गई। श्रद्धालुओं ने भगवान के अभिषेक में भाग लेकर आत्मिक शांति की अनुभूति की। अंत में सामूहिक आरती एवं मंगल पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
समाज के पदाधिकारियों ने बताया कि इस प्रकार के आयोजन समाज में एकता, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करते हैं। महोत्सव में बड़ी संख्या में समाजजन, महिलाएं, युवा एवं बच्चे उपस्थित रहे।
पूरे नगर में दिनभर धार्मिक उत्साह और भक्ति का वातावरण बना रहा, जिसने सभी के मन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया।