सिंगरौली मध्य प्रदेश
जिला चिकित्सालय सह ट्रॉमा सेंटर की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में ट्रॉमा सेंटर से सामने आए एक वीडियो ने पूरे स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। वीडियो में करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए वेंटिलेटर और अन्य जीवनरक्षक उपकरण धूल खाते दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य केवल कुछ मशीनों की बदहाली नहीं, बल्कि जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है।
जानकारी के अनुसार कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से जिला अस्पतालों और ट्रॉमा सेंटरों को अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए गए थे। इनमें वेंटिलेटर, मॉनिटर, ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण मशीनें शामिल थीं, ताकि गंभीर मरीजों को स्थानीय स्तर पर बेहतर इलाज मिल सके और उन्हें बड़े शहरों की ओर रेफर करने की आवश्यकता कम हो।
लेकिन सिंगरौली जिला अस्पताल की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। अस्पताल में करोड़ों की मशीनें मौजूद होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप गंभीर मरीजों को आज भी वाराणसी, रीवा, जबलपुर और भोपाल जैसे बड़े शहरों के अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है। इससे मरीजों के परिजनों को आर्थिक, मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग ने उपकरण तो खरीद लिए, लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए न पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराया गया और न ही नियमित तकनीकी देखरेख की समुचित व्यवस्था की गई। कई बार मशीनें केवल रखरखाव के अभाव में बंद पड़ी रहती हैं, जबकि अस्पताल प्रशासन इसे तकनीकी कारण बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करता है।
सिंगरौली एक तेजी से विकसित हो रहा औद्योगिक जिला है, जहां प्रतिदिन भारी वाहनों का आवागमन होता है। सड़क दुर्घटनाएं, औद्योगिक हादसे और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं यहां आम हैं। ऐसे में जिला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन यदि यहां मौजूद संसाधनों का उपयोग ही नहीं हो रहा, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता है बल्कि आम जनता के साथ अन्याय भी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अस्पताल की मजबूती केवल भवन और मशीनों से नहीं होती, बल्कि उन्हें संचालित करने वाली व्यवस्था से होती है। यदि करोड़ों के उपकरण सिर्फ धूल खाने के लिए छोड़ दिए जाएं, तो यह सरकारी धन की बर्बादी और स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
अब जिले के नागरिकों ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, निष्क्रिय पड़े उपकरणों को तत्काल चालू कराया जाए, आवश्यक विशेषज्ञ डॉक्टरों एवं तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
जनता का कहना है कि सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों रुपये तभी सार्थक होंगे, जब ये उपकरण कागजों में नहीं बल्कि मरीजों की जिंदगी बचाने में दिखाई देंगे। सिंगरौली की जनता अब जवाब चाहती है कि आखिर कब तक स्वास्थ्य व्यवस्था यूं ही धूल खाती रहेगी।
सिंगरौली आशीष कुमार सोनी
जिला रिपोर्टर