काला धुआं, जहरीला पानी और बढ़ती बीमारियां! टायर फैक्ट्री के खिलाफ 8 गांवों का अल्टीमेटम
ग्राम सालारपुरा की सुबह अब चिड़ियों से नहीं, मशीनों की घरघराहट से होती है। गांव के किनारे 2 साल पहले लगी टायर फैक्ट्री ने सब बदल दिया।
*फैक्ट्री का प्रभाव*
पहले खेतों में गेहूं और सरसों लहराती थी। अब हवा में प्लास्टिक जलने की गंध रहती है। फैक्ट्री का काला धुआं 24 घंटे निकलता है। तालाब का पानी काला पड़ गया, क्योंकि केमिकल वाला पानी सीधे उसी में छोड़ दिया जाता है। 8 गांव के खेत बंजर होने लगे। जो गाय-भैंस उस पानी को पीती, उनका दूध फट जाता।
*जनता में बीमारी*
पिछले 1 साल में सालारपुरा की क्लिनिक भरी रहने लगी। छोटे बच्चों को सांस की बीमारी, बुजुर्गों को खांसी जो रुकती ही नहीं। स्कूल की मास्टरनी कहती है – “बच्चे 10 मिनट खेलें तो थककर बैठ जाते हैं।” पंचायत में मनोज की अम्मा कैंसर से लड़ रही हैं। डॉक्टर बोले “प्रदूषण की वजह से।” सचिन के घर 3 लोग दमा के मरीज बन गए।
*और आक्रोश*
21 जून को चौपाल पर BKU नई क्रांति की बैठक हुई। 8 गांव के लोग इकट्ठा हुए। पंकज बोला “हमारा अनाज जहर हो गया, हमारी सांसें बिक गईं। प्रशासन आंख बंद करके बैठा है।” विक्रम सिंह ने हाथ उठाकर कहा “अगर 30 जून तक फैक्ट्री बंद नहीं हुई, शापर केम्री सील नहीं हुई, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। सड़क जाम करेंगे, कलेक्ट्रेट घेरेंगे।”
चौधरी प्रेम सिंह राणा का लेटर उसी आक्रोश की स्याही से लिखा गया। कागज पर अल्टीमेटम था, दिलों में आग थी।
*नियम/एक्ट*
गांव वालों के पास अब “पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986” और “जल वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1974” की कॉपी है। वो कहते हैं – “कानून कहता है बिना NOC के फैक्ट्री नहीं चल सकती। केमिकल पानी नदी में नहीं छोड़ सकते। तो फिर शासन-प्रशासन क्यों सो रहा है?”
अब सब 30 जून का इंतजार कर रहे हैं। या तो फैक्ट्री का ताला लगेगा, या सालारपुरा की सड़कों पर आंदोलन का शोर होगा। रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़