अकरम खान पटेल की रिपोर्ट
दिल्ली के जंतर-मंतर की जमीन आज सिर्फ पत्थर नहीं है। वो एक आईना है। उस आईने में देश का युवा खड़ा है – थका हुआ, गुस्से में, और सवालों से लदा हुआ।सत्ता एक तरफ, जनतंत्र दूसरी तरफ। और बीच में खड़ा है भारत का युवा।उसे मुफ्त की रेवड़ी नहीं चाहिए। उसे मेरिट की इज्जत चाहिए।
परीक्षा का पेपर लीक नहीं, पारदर्शिता चाहिए।
डिग्री के बाद बेरोजगारी का सर्टिफिकेट नहीं, रोजगार चाहिए।
सोशल मीडिया पर भाषण नहीं, जमीनी नौकरी चाहिए।वो 18 घंटे पढ़कर भी “अनुभव नहीं है” सुनकर थक चुका है। वो 2 साल तैयारी करके पेपर रद्द होने पर फिर से जीरो से शुरू करने से टूट चुका है।डिप्रेशन विलासिता नहीं है। ये सिस्टम की नाकामी का लक्षण है।
जब मेहनत की कोई कीमत नहीं, जब जुगाड़ मेरिट पर भारी पड़े, जब नेता के बेटे को पोस्टिंग और किसान के बेटे को लाठी मिले – तो उम्मीद मरती है। और उम्मीद के मरने का नाम ही डिप्रेशन है।आज का युवा इंस्टाग्राम पर रील नहीं, अपने भविष्य की रील रिवाइंड कर रहा है। और हर बार अंत वही – “वेकेंसी नहीं है”।सरकार का काम नारेबाजी नहीं, नीति बनाना है।पेपर लीक पर सख्त कानून और फास्ट ट्रैक सजा।सिर्फ घोषणा नहीं, हर साल कितनी भर्ती, कितनी नियुक्ति – उसका व्हाइट पेपर।लाठी और बैरिकेड से पहले बातचीत की मेज। युवा सड़क पर इसलिए है क्योंकि उसके पास सुनने वाला कोई नहीं।लोकतंत्र में असहमति गद्दारी नहीं होती। वो लोकतंत्र की सांस होती है जब सवाल बड़े हो जाएं और जवाब छोटे, तो सत्ता डर जाती है। डर के मारे वो बैरिकेड लगाती है, इंटरनेट बंद करती है, नेताओं को हाउस अरेस्ट करती है।लेकिन इतिहास गवाह है – चिंगारी को जितना दबाओगे, वो उतनी तेज़ी से फैलेगी। आज जंतर-मंतर में 10000 युवा हैं। कल 1 लाख होंगे। परसों ये आंदोलन हर जिले की कोचिंग, हर गांव के चौराहे तक पहुंच जाएगा।इस वेक्यूम को भरना होगा। अगर समय रहते संवाद नहीं हुआ, अगर रोजगार और सम्मान नहीं मिला, तो ये चिंगारी विस्फोट बन जाएगी। और वो विस्फोट न तोड़-फोड़ का होगा, न हिंसा का। वो होगा “युवा क्रांति” का – वोट, विचार और विकल्प का विस्फोट।