सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब गोंदलामऊ ब्लॉक में भ्रष्टाचार का यह खेल खुलेआम चल रहा है तब जिला स्तर का उच्च प्रशासन क्यों आंखें मूंदे बैठा है? ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा कई बार लिखित शिकायतें देने के बावजूद जिला मुख्यालय से कोई ठोस जांच टीम गोंदलामऊ नहीं भेजी गई। अधिकारियों की इस अनदेखी और मौन के कारण गोंदलामऊ के आम नागरिकों में भारी रोष व्याप्त है। लोगों का मानना है कि निचले स्तर के इस सिंडिकेट को ऊपर तक संरक्षण हासिल है जिसके कारण गोंदलामऊ के विकास पर ग्रहण लग चुका है।सीतापुर। जिले के गोंदलामऊ ब्लॉक से विकास के नाम पर सरकारी धन की लूट-खसोट की एक बेहद गंभीर और रूह कंपा देने वाली तस्वीर सामने आ रही है। कागजों पर तो विकास की नदियां बहाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गोंदलामऊ में घोटालेबाजों का एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय है जो सरकारी बजट को दीमक की तरह चाट रहा है।ग्रामीणों और स्थानीय जागरूक नागरिकों का स्पष्ट आरोप है कि खंड विकास अधिकारी शिवजीत के कार्यकाल में जितने भी विकास कार्य हुए हैं या वर्तमान में जारी हैं। यदि उन सभी की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो करोड़ों रुपये का बड़ा घोटाला उजागर हो सकता है।गोंदलामऊ ब्लॉक में विकास कार्यों का निष्पादन पारदर्शी तरीके से होने के बजाय कुछ चुनिंदा दलालों, भ्रष्ट कर्मचारियों और जिम्मेदारों के एक मजबूत सिंडिकेट के हाथों में सिमट कर रह गया है। ब्लॉक में किसी भी नए प्रोजेक्ट के स्वीकृत होते ही काम की गुणवत्ता तय करने के बजाय कमीशन और फर्जीवाड़े का खेल शुरू हो जाता है। खड़ंजा निर्माण, नाली निर्माण, इंटरलॉकिंग, पौधरोपण जैसे बुनियादी कार्य केवल फाइलों और मस्टर रोल तक ही सीमित रह गए हैं। धरातल पर घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर बजट को आपस में बांट लिया जाता है।ग्रामीण गरीबों और मजदूरों को उनके ही गांव में रोजगार देने के उद्देश्य से शुरू की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) गोंदलामऊ ब्लॉक में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बन चुकी है। गांव के गरीब मजदूर आज भी काम की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं जबकि मनरेगा के तहत उनके नाम पर जाली हाजिरी (मस्टर रोल) भरकर राशि ऐंठी जा रही है। नियमों को ताक पर रखकर रात के अंधेरे में जेसीबी और ट्रैक्टरों से मिट्टी खनन व समतलीकरण का कार्य कराया जाता है और इसका भुगतान कागजी मजदूरों के खातों में दिखाकर सिंडिकेट द्वारा निकाल लिया जाता है। रोजगार के हकदार जरूरतमंदों के चूल्हे ठंडे पड़े हैं और घोटालेबाज मनरेगा के फंड पर ऐश कर रहे हैं। गोंदलामऊ ब्लॉक की इस बदहाली के केंद्र में बीडीओ शिवजीत का कार्यकाल रहा है स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि बीडीओ शिवजीत के समय में स्वीकृत और निष्पादित हुआ हर एक विकास कार्य जांच के दायरे में आता है। जब भी किसी पंचायत से भ्रष्टाचार या धांधली की शिकायत बीडीओ तक पहुंचती है तो उस पर सख्त कदम उठाने के बजाय लीपापोती कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इस तरह के कारण घोटालेबाजों का सिंडिकेट दिन-ब-दिन और बेखौफ होता जा रहा है।
इंडियन टीवी न्यूज़ नेशनल रोचक शुक्ला