शौर्य और साहित्य दिवस पर दोनों महान विभूतियों को पेश किया ख़िराज-ए-अक़ीदत, देशभक्ति और साहित्य पर हुई सार्थक चर्चा
चाँदपुर (बिजनौर)। परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के शहादत दिवस एवं प्रसिद्ध ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की जयंती के अवसर पर गुरुवार को मेरठ नर्सिंग होम, चाँदपुर में “शौर्य और साहित्य दिवस” के रूप में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मेजर दानिश फ़ारूक़ी ने वीर अब्दुल हमीद और दुष्यंत कुमार के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर दोनों महान विभूतियों को ख़िराज-ए-अक़ीदत एवं श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर मेजर दानिश फ़ारूक़ी ने कहा कि वीर अब्दुल हमीद ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अदम्य साहस, बहादुरी और सर्वोच्च बलिदान की ऐसी मिसाल कायम की, जो भारतीय सैन्य इतिहास में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगी। उनका जीवन देश के प्रत्येक नागरिक और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। देश की सुरक्षा के लिए उनका समर्पण और शहादत हमेशा राष्ट्र को गौरवान्वित करती रहेगी।
उन्होंने कहा कि वीर अब्दुल हमीद की वीरता हमें यह संदेश देती है कि देश की रक्षा और सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं है। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने जिस साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह भारतीय सैनिक की अदम्य भावना का प्रतीक है।
वहीं, ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार को याद करते हुए मेजर दानिश फ़ारूक़ी ने कहा कि दुष्यंत कुमार ने अपनी लेखनी के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा, सामाजिक विषमताओं और व्यवस्था की विसंगतियों को बेबाकी से अभिव्यक्ति दी। उनकी रचनाओं में समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है। उनकी शायरी आज भी लोगों को सोचने, सवाल उठाने और बदलाव के लिए आवाज़ बुलंद करने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि वीर अब्दुल हमीद का शौर्य और दुष्यंत कुमार की कलम दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में समाज और राष्ट्र को दिशा देने वाली प्रेरणादायी विरासत हैं। एक ने अपनी वीरता से मातृभूमि की रक्षा की, तो दूसरे ने अपनी लेखनी से समाज की आवाज़ को बुलंद किया।
कार्यक्रम में अधिवक्ता शैलेंद्र चौधरी ने मेजर दानिश फ़ारूक़ी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वीर अब्दुल हमीद की बहादुरी और दुष्यंत कुमार की साहित्यिक चेतना आज की पीढ़ी के लिए बेहद प्रासंगिक है। दोनों महान व्यक्तित्वों ने अपने-अपने क्षेत्र में असाधारण योगदान देकर देश और समाज के सामने प्रेरणा की मिसाल कायम की।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों ने दोनों महान विभूतियों के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया तथा उनके जीवन, संघर्ष, विचार और योगदान को याद किया। वक्ताओं ने कहा कि वीर अब्दुल हमीद का अदम्य साहस और दुष्यंत कुमार की बेबाक लेखनी आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी।
इस अवसर मेजर दानिश फारूकी ने दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध पंक्तियों को भी याद किया
“हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने वीर अब्दुल हमीद के राष्ट्रप्रेम, साहस एवं बलिदान तथा दुष्यंत कुमार की सामाजिक चेतना और साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।