बिहार से नेपाल तक फैली है माता की महिमा, 1977 में हुआ मंदिर का निर्माण; नवरात्र में लगता है भव्य मेला
रिपोर्ट: अजय कुमार, शिवहर।
शिवहर। शिवहर की धरती पर भगवान शिव की आराधना के साथ शक्ति की उपासना की भी समृद्ध परंपरा रही है। जिले के विभिन्न देवी मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के प्रतीक हैं। इन्हीं में पिपराही प्रखंड के दोस्तियां स्थित राजदेवी मंदिर की विशेष पहचान है। यहां माता दुर्गा के दर्शन के लिए बिहार के विभिन्न जिलों के साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मिट्टी की तीन पिंडियों से जुड़ी लोकमान्यताएं इस धार्मिक स्थल को विशिष्ट बनाती हैं।
शिवहर-पिपराही-बेलवा-ढाका स्टेट हाईवे (एसएच-54) के किनारे स्थित यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि इसके आसपास विकसित राजदेवी चौक बाजार की पहचान भी इसी मंदिर से जुड़ी है।
जंगल में प्रकट हुई थीं मिट्टी की तीन पिंडियां
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, करीब एक सदी पहले दोस्तियां का यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस समय दोपहर के बाद यहां से गुजरने में भी लोग डरते थे। लोकमान्यता है कि जंगल में एक विशाल पीपल के पेड़ की जड़ों के पास मिट्टी की तीन पिंडियां प्रकट हुई थीं। धीरे-धीरे आसपास के लोगों ने यहां पूजा-अर्चना शुरू कर दी।
क्षेत्र में प्रचलित एक अन्य लोककथा के अनुसार, जंगल से गुजरने वाले राहगीरों पर जब जंगली जानवरों या डकैतों का खतरा मंडराता था, तब एक वृद्ध महिला प्रकट होकर उनकी रक्षा करती थीं। इस मान्यता के कारण माता को ‘जंगली राजदेवी’ के नाम से पुकारा जाने लगा। समय के साथ यह स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। हालांकि, मंदिर की प्राचीन पिंडियों से जुड़ी इन कथाओं का आधार स्थानीय लोकपरंपराएं और जनश्रुतियां हैं।
1977 में हुआ मंदिर का निर्माण
स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले यहां मिट्टी की पिंडियों की पूजा लोकदेवी के रूप में की जाती थी। वर्ष 1977 में ग्रामीणों ने आपसी सहयोग और चंदा एकत्र कर मंदिर का निर्माण कराया। इसके बाद मंदिर में माता दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई।
बागमती नदी पर तटबंध निर्माण और गांव के पुनर्वास के दौर में भी इस धार्मिक स्थल का महत्व बना रहा। समय के साथ मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ी और यह स्थान राजदेवी चौक के रूप में विकसित होने लगा।
खेत-खलिहान से राजदेवी चौक बाजार तक का सफर
चार दशक पहले तक मंदिर के आसपास खेत-खलिहान दिखाई देते थे। आज यहां राजदेवी चौक के रूप में बाजार विकसित हो चुका है। सड़क से गुजरने वाले कई श्रद्धालु माता के दरबार में माथा टेककर अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हैं।
स्थानीय दुकानदारों के बीच भी मंदिर के प्रति विशेष श्रद्धा है। कई दुकानदार सुबह अपनी दुकान खोलने से पहले माता के दर्शन करते हैं। इस तरह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय जनजीवन और व्यापारिक गतिविधियों से भी जुड़ा हुआ है।
नवरात्र में नौ दिनों तक रहती है रौनक
शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान राजदेवी मंदिर में विशेष चहल-पहल रहती है। नौ दिनों तक पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और मेले का आयोजन होता है। मंदिर के आसपास नारियल, चुनरी, प्रसाद और खाने-पीने की दुकानें सजती हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ से पूरा इलाका भक्तिमय हो उठता है।
मंदिर के पुजारी राम अयोध्या पांडेय बताते हैं कि श्रद्धालुओं की माता के प्रति गहरी आस्था है। लोग संतान प्राप्ति, परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना लेकर यहां आते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु माता को नारियल और चुनरी अर्पित करते हैं।
राजदेवी मंदिर की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, लोकविश्वास, सामाजिक जीवन और क्षेत्रीय संस्कृति के संगम के रूप में भी है। मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का दस्तावेजीकरण और बुनियादी पर्यटन सुविधाओं का विकास किया जाए तो यह स्थल शिवहर के धार्मिक पर्यटन को नई पहचान दिला सकता है।