डिजिटल मीडिया, उत्तरदायित्व और लोकतंत्र का चौराहे: एक वैचारिक विमर्श
भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान ऐतिहासिक मुहाने पर खड़े होकर जब हम पत्रकारिता, संवैधानिक संस्थाओं (संसद, उच्चतम न्यायालय और प्रेस काउंसिल) और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (पोर्टल्स व सोशल मीडिया) के आपसी संबंधों का विश्लेषण करते हैं, तो एक गहरा विसंगतिपूर्ण संकट सामने आता है। आज एक तरफ जहाँ सूचनाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ है और हर हाथ में मोबाइल कैमरा व इंटरनेट ने एक डिजिटल प्रस्तोता को जन्म दिया है, वहीं दूसरी तरफ प्रामाणिकता, विश्वसनीयता और संस्थागत मर्यादा का भारी क्षरण हुआ है।
जब संसद, उच्चतम न्यायालय या प्रेस काउंसिल जैसे शीर्ष संस्थान डिजिटल मीडिया की अनियंत्रित और कभी-कभी सनसनीखेज सामग्री को वैधानिक या पेशेवर प्रमाणिकता देने से इनकार करते हैं, तो यह केवल तकनीकी अड़चन नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि “‘सूचना के विस्फोट’ और ‘पत्रकारकीय उत्तरदायित्व’ के बीच एक चौड़ी खाई पैदा हो गई है।”
1. वर्तमान संकट: संवैधानिक संस्थाओं की बेरुखी बनाम डिजिटल अराजकता
डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स और सोशल मीडिया के संदर्भ में यह कड़वी सच्चाई है कि इनका एक बड़ा हिस्सा बिना किसी संपादकीय नियंत्रण (Editorial Filter), फैक्ट-चेकिंग प्रोटोकॉल और नैतिक दायित्व के संचालित हो रहा है।
* संवैधानिक अविश्वास: संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं द्वारा सोशल मीडिया या अनियंत्रित पोर्टल्स की सामग्री को प्रमाणिक न मानना स्वाभाविक भी है, क्योंकि जहाँ पारंपरिक प्रेस के लिए एक वैधानिक जवाबदेही और आचार संहिता तय है, वहीं डिजिटल स्पेस में ‘व्यूज’, ‘क्लिकबेट’ और एल्गोरिदम की दौड़ ने तथ्यों को पीछे छोड़ दिया है।
* संस्थाओं पर सुनियोजित हमले: दूसरी ओर, जब राजनीतिक या वैचारिक उद्देश्यों के तहत इन सर्वोच्च संस्थाओं की गरिमा को सोशल मीडिया के जरिए धूमिल करने का प्रयास किया जाता है, तब लोकतंत्र के बुनियादी स्तंभ हिलने लगते हैं।
किंतु, इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि जब मुख्यधारा का पारंपरिक मीडिया भी सत्ता या शक्ति के दबाव में अपनी निष्पक्षता खो बैठता है और ‘पीत पत्रकारिता’ (Yellow Journalism) या एक-पक्षीय प्रोपेगेंडा का माध्यम बन जाता है, तब जनता का विश्वास बचाने का काम यही डिजिटल और स्वतंत्र पोर्टल्स करते हैं। इसलिए, एक पक्ष को पूरी तरह खारिज करना और दूसरे पक्ष की अराजकता को नजरअंदाज करना—दोनों ही दृष्टियाँ लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
2. एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी विनियामक (Regulatory) ढांचे का स्वरूप
इस द्वंद्व से बाहर निकलने का एकमात्र उपाय सेंसरशिप (Censorship) नहीं है, बल्कि एक ऐसा “स्वतंत्र, स्वायत्त और पारदर्शी सह-नियामक (Co-regulatory) ढांचा” है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) की रक्षा भी करे और उसकी सीमाओं के भीतर उत्तरदायित्व भी तय करे। ऐसा ढांचा निम्नलिखित स्तंभों पर आधारित होना चाहिए:
क. वैधानिक हस्तक्षेप से मुक्त ‘स्वायत्त डिजिटल मीडिया परिषद’ (Independent Digital Media Council)
* जिस प्रकार प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) प्रिंट मीडिया के लिए है, उसी तर्ज पर डिजिटल पोर्टल्स और स्वतंत्र समाचार माध्यमों के लिए एक स्वतंत्र, गैर-सरकारी और स्वायत्त नियामक निकाय का गठन होना चाहिए।
* इस परिषद में सरकार के नुमाइंदों का दखल न्यूनतम होना चाहिए। इसमें वरिष्ठ पत्रकार, न्यायविद्, तकनीकी विशेषज्ञ, शिक्षाविद और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि यह सत्ता के दबाव से पूरी तरह मुक्त रहकर काम कर सके।
ख. ‘सेल्फ-रेगुलेशन’ (स्व-नियमन) का त्रि-स्तरीय मॉडल और पारदर्शिता
* डिजिटल पब्लिशर्स को खुद अपनी आंतरिक शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal Mechanism) को मजबूत करना होगा।
* यदि कोई पोर्टल या सोशल मीडिया चैनल किसी खबर को लेकर पक्षपातपूर्ण या भ्रामक आचरण करता है, तो शिकायत मिलने पर यह स्वायत्त निकाय पारदर्शी सुनवाई करे। इसमें आर्थिक दंड या सुधार का मौका देने का प्रावधान हो, न कि सीधे तौर पर वेबसाइट को ब्लॉक करने या ताला लगाने की दमनकारी नीति।
ग. एल्गोरिदम पारदर्शिता और जवाबदेही (Algorithmic Accountability)
* आज डिजिटल मीडिया की दिशा और दशा केवल पोर्टल्स तय नहीं करते, बल्कि टेक जायंट्स (जैसे मेटा, गूगल, एक्स आदि) के एल्गोरिदम तय करते हैं कि कौन सी खबर करोड़ों लोगों तक पहुँचेगी और कौन सी दबी रह जाएगी।
* नए विनियामक ढांचे में इन तकनीकी दिग्गजों के लिए यह अनिवार्य किया जानाC चाहिए कि वे अपने एल्गोरिदम की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता रखें, ताकि सनसनीखेज, फर्जी (Fake News) या हेट स्पीच फैलाने वाली सामग्री को कृत्रिम रूप से हवा न मिल सके।
घ. संपादकीय नैतिकता और ‘फैक्ट-चेकिंग’ को अनिवार्य संस्थागत मान्यता
* डिजिटल माध्यमों के लिए एक स्पष्ट आचार संहिता (Code of Ethics) हो, जिसमें यह तय हो कि डिजिटल पत्रकारिता करने वाले संस्थानों के लिए एक पेशेवर संपादक और स्थापित संपादकीय बोर्ड का होना अनिवार्य है, जो सामग्री के प्रकाशन से पहले उसकी सत्यता की पुष्टि करे।
3. सच्ची पत्रकारिता का तकाजा: दोनों पक्षों का संतुलन
सच्ची पत्रकारिता न तो सत्ता की चाटुकारिता है और न ही सोशल मीडिया पर लाइक्स और व्यूज के लिए फैलाई गई सनसनी। सच्ची पत्रकारिता वह है जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए उनकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की मांग करे, और साथ ही डिजिटल माध्यमों की ऊर्जा को अराजकता से बचाकर उसे एक रचनात्मक और तथ्यात्मक दिशा दे।
यदि हम एक ऐसा प्रभावी ढांचा बनाने में सफल होते हैं जो सेंसरशिप की कालिख से मुक्त हो और उत्तरदायित्व के प्रकाश से परिपूर्ण हो, तभी भारतीय पत्रकारिता अपने स्वर्णिम अतीत के साथ न्याय कर पाएगी और लोकतंत्र जीवंत बना रहेगा।