- तमिलनाडु से बड़ौत पहुंचे श्रद्धालु, आचार्य श्री आर्जवसागर जी के चरणों में व्यक्त की अटूट गुरुभक्ति
256 अर्घ्य समर्पित कर श्रद्धालुओं ने की सिद्ध परमेष्ठी की आराधना, सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिन उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
बड़ौत। गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण का भाव हो, तो हजारों किलोमीटर की दूरी भी आस्था के मार्ग में बाधा नहीं बनती। धर्मनगरी बड़ौत में परम पूज्य आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ के पावन सान्निध्य में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिन ऐसा ही भावपूर्ण दृश्य देखने को मिला। तमिलनाडु से 20 प्रतिमाधारी और 12 अणुव्रती श्रद्धालु विशेष रूप से बड़ौत पहुंचे और आचार्य श्री के दर्शन कर अपनी अटूट गुरु निष्ठा व्यक्त की। दक्षिण भारत से उत्तर प्रदेश की धर्मभूमि तक पहुंचे श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष बना दिया।
तमिलनाडु से बड़ौत तक गुरुभक्ति ने जोड़ी आस्था की डोर
आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज का पूर्व में तमिलनाडु में सात वर्ष का प्रवास रहा है। इसी आध्यात्मिक जुड़ाव और गुरु के प्रति श्रद्धा के भाव से तमिलनाडु से आए श्रद्धालुओं ने बड़ौत पहुंचकर गुरु दर्शन किए। भाषा, प्रदेश और भौगोलिक दूरियों से परे गुरु के चरणों में समर्पित भक्तों की उपस्थिति ने जैन समाज की आध्यात्मिक एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया। श्रद्धालुओं के लिए यह अवसर गुरु के प्रति विनय, कृतज्ञता और भक्ति व्यक्त करने का माध्यम बना।
256 अर्घ्य समर्पित कर की सिद्ध परमेष्ठी की आराधना
मंडी बड़ौत स्थित अजितनाथ सभागार में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिन जिनभक्ति और धर्माराधना का विशेष उत्साह देखने को मिला। प्रातःकाल जिनेंद्र भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ धार्मिक कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ। इसके बाद श्रद्धालुओं ने विधि-विधानपूर्वक पूजन कर सिद्ध परमेष्ठी के चरणों में 256 अर्घ्य समर्पित किए।
विधानाचार्य पं. सनत कुमार जैन एवं पं. विनोद कुमार जैन के निर्देशन में धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। संतोष म्यूजिकल ग्रुप की संगीतमय प्रस्तुतियों ने पूरे सभागार को भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालु भक्ति और उत्साह के साथ पूजन में सहभागी बने।
आत्मशुद्धि और गुणाराधना का संदेश
आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में सिद्धचक्र महामंडल विधान की आध्यात्मिक महत्ता बताते हुए कहा कि जिनेंद्र भगवान की आराधना का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं का निर्वाह करना नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना है। अर्घ्य समर्पण के माध्यम से साधक सिद्ध परमेष्ठी के अनंत गुणों का स्मरण करता है और अपने जीवन को उन गुणों के अनुरूप बनाने की प्रेरणा प्राप्त करता है।
उन्होंने बताया कि सिद्ध परमेष्ठी वह अवस्था है, जिसमें आत्मा समस्त कर्मबंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। सिद्धों की आराधना हमें यह प्रेरणा देती है कि संसार के सुख क्षणिक हैं, जबकि आत्मिक शांति और कर्मों से मुक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है।
आचार्य श्री ने कहा कि धर्माराधना तभी सार्थक होती है, जब श्रद्धा के साथ जीवन में संयम, विनय, सदाचार और आत्मचिंतन का समावेश हो। मन, वचन और काया की शुद्धि, कषायों पर नियंत्रण तथा सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को पूजा और विधान के साथ दैनिक जीवन में भी धर्म के सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा दी।
15 अक्टूबर तक चलेगा सिद्धचक्र महामंडल विधान
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं। आचार्य श्री का पावन सान्निध्य समाज को धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझने और उन्हें जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दे रहा है।
श्री 1008 अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी, मंडी बड़ौत के तत्वावधान में आयोजित यह विधान 8 अक्टूबर से 15 अक्टूबर 2026 तक चल रहा है। प्रतिदिन होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों, पूजन और आध्यात्मिक प्रवचनों से बड़ौत का वातावरण धर्ममय बना हुआ है। नगर एवं आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं।
तमिलनाडु से पधारे श्रद्धालुओं सहित सभी भक्तों की सहभागिता ने गुरु निष्ठा, समर्पण और आध्यात्मिक एकता का प्रेरक संदेश दिया।