मुंह लटकी तस्वीर हकीकत बयां कर रही.
भाजपा पर अपनी जमीन खिसकने का डर हावी होने लगा है.
सवर्ण वाद के बाद पिछड़ा कार्ड खेलने की तैयारी में है भाजपा.
यूपी भाजपा ने कुल 29 सीटों का नुकसान सहा है,लगभग 48 सीटों पर 50 हजार से लेकर 1.5 लाख वोटों में गिरावट आई है,
पिछली बार 62 सीटें जीतने वाली यूपी भाजपा को 49.6% तो इस बार 41.5% वोट प्राप्त हुए.
यह गिरावट भाजपा की हार का बड़ा कारण साबित हुआ.
खुद प्रधानमंत्री 2019 में 4.8 लाख के बड़े मार्जिन से जीते,इस बार अंतर 1.5 लाख के आसपास ही सिमट गया.
कहा जा रहा वो भी उन्हें जबरदस्ती जिताया गया,वरना मार्जिन और कम रहता.
परिणाम का गाज आखिरकार किसी न किसी पर तो गिरना ही है.
केशव प्रसाद मौर्य को भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी,भाजपा ने यूपी विधानसभा में परचम लहराया,भाजपा की सरकार बनी लेकिन मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को बना दिया गया.
नतीजा यूपी में जातिवाद हावी हो गया,जगह जगह ठाकुरवाद हावी दिखा.
गैर ठाकुरों के एनकाउंटर किए जाने लगे.
नतीजा पिछड़ों में क्षोभ और गुस्सा पनपा,जो 5 साल तक शांत रहा लेकिन उसका असर चुनाव में दिखा.
अखिलेश ने इसका लाभ उठाया.
कुशवाहा मौर्य शाक्य सैनी वोटों के लिए बाबू सिंह कुशवाहा की पार्टी से गठबंधन किया और नतीजा देखिए,भाजपा जमीन सूंघ गई.
बहुत हद तक राजपूत संगठनों के घमंड ने भी भाजपा से कुशवाहा मौर्य शाक्य सैनी वोटों को दूर कर दिया.
चुनाव के समय पूरा सोशल मीडिया राजपूत संगठनों के जातिवाद से सराबोर दिखा.
नतीजा पिछड़ों के वोट PDA के पक्ष में एकजुट होने लगे.
अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने बाजी मार ली.
आखिर कब तक कोई कौम किसी पार्टी की गुलामी करता रहता.
हरेक सीटों पर 50 हजार से लेकर 1.5 लाख तक के कुशवाहा मौर्य शाक्य सैनी के वोटों ने कमाल दिखाया और भाजपा जमीन पर आ गिरी.
शायद अब भाजपा की नींद खुली है.
यूपी भाजपा परिवर्तन की सर्वप्रथम गवाह बनेगी ऐसी अब संभावना बन चुकी है.
कहते हैं मजबूरी में गधे को भी बाप बनाना पड़ता है,यह तो राजनीति है.
यहां दामाद भी बनाने का चलन है.! रिपोर्टर रमें सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़