रीवा ब्यरो चीफ रिप्पू पाण्डेय
रीवा आए नए कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी ने पदभार संभालते ही यहां वर्षों से अजगर की तरह बैठे अधिकारियों-कर्मचारियों का कान ऐंठना शुरू कर दिया। ऐसा लगा मानो उन्हें रीवा की प्रशासनिक सुस्ती के बारे मेेंं पहले से ही जानकारी थी। श्री सूर्यवंशी ने जब सालों से फाइलों में कैद मामलों को देखा तो उन्होंने सवाल पूछा और कलेक्टर साहब का सवाल अधिकारियों-कर्मचारियों को रास नहीं आया। वैसे भी यहां के कर्मचारियों को पसंद नहीं है कि कोई उनसे सवाल पूछे या कोई उन्हें काम करने के लिए कहे।
यदि गलती से भी किसी वरिष्ठ अधिकारी ने कुछ कह दिया तो कर्मचारी सीधे अपने आका के पास पहुंच जाते हैं और फिर शुरू हो जाती है उस अधिकारी के पर कतरने की कुत्सित साजिश। नए कलेक्टर श्री सूर्यवंशी जी के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। कर्मचारी उन पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ज्ञापन और हड़ताल की शुरुआत हो चुकी है।
लेकिन इन सबके इतर, रीवा के सरकारी कर्मचारियों को विरोध के बजाय आत्ममंथन की जरूरत है। उन्हें ये गंभीरता से सोचना चाहिए कि उनकी छवि इतनी खराब क्यों है। जिस दिन ओहदा खत्म हो जाएगा, रिटायर हो जाएंगे, उस दिन वो समाज में कौन सा मुंह लेकर लोगों के बीच उठे-बैठेंगे।
कल जब कर्मचारियों ने कमिश्नर से कलेक्टर श्री सूर्यवंशी की शिकायत की तो पूरा सोशल मीडिया कलेक्टर के पक्ष में आ खड़ा हुआ। आम जनता भी कलेक्टर के साथ खड़ी दिखी। सोशल मीडिया में इस घटनाक्रम को लेकर कई लोगों ने लिखा-बोला।
मैं अनुरोध करना चाहता हूं कलेक्टर के विरोध में उतरे उन कर्मचारियों से कि वो सोशल मीडिया में खबरों-टिप्पणियों पर आई प्रतिक्रियाओं को पढ़ें। 99.9 फीसदी प्रतिक्रियाएं कर्मचारियों के विरोध में हैं। लोगों ने अपने-अपने तरीके से गुस्से का इजहार किया है और कलेक्टर द्वारा उठाए जा रहे कदम का स्वागत किया है। बहुत सारे लोगों ने तो कर्मचारियों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया है।
ऐसे में कर्मचारियों की कार्यशैली का अनुमान लगाना बहुत आसान है। सोशल मीडिया पर आ रहीं प्रतिक्रियाएं खुलेतौर पर बता रही हैं कि रीवा के कर्मचारियों से यहां के लोग कितनी नफरत करते हैं। यदि नौकरी, कर्तव्य, निष्ठा और जनता के प्रति जवाबदेही को किनारे कर दिया जाए तो कर्मचारियों को ये जरूर सोचना चाहिए कि समाज में उनकी साख कितनी बदतर स्थिति में है। जब वह रिटायर होंगे और उनसे ओहदा छिन जाएगा तब वो किस हालत में एक सामान्य जीवन जी पाएंगे। अगर अब भी कलेक्टर का विरोध कर रहे कर्मचारी इन सब बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं तो ये मानना चाहिए कि उनमें लाज नाम की कोई चीज नहीं बची है।