महाकाल लोक के बाद अब कोटेश्वर धाम के विकास की मांग तेज
सिंहस्थ-2028 से पहले सड़क, श्रद्धालु सुविधाएं, सत्संग भवन और पर्यटन विकास की उठी मांग, श्रीकृष्ण पाथेय में शामिल करने की भी अपेक्षा
बदनावर। उज्जैन में महाकाल लोक और धार में प्रस्तावित धार लोक की तर्ज पर अब मालवा-निमाड़ अंचल के प्राचीन कोटेश्वर महादेव धाम को भी धार्मिक दृष्टि से विकसित करने की मांग तेज हो गई है। आगामी सिंहस्थ महाकुंभ-2028 को देखते हुए श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाएं, बेहतर सड़क संपर्क, पार्किंग, सत्संग भवन, घाटों का विकास, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था तथा पर्यटन सुविधाएं विकसित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। क्षेत्रवासियों का मानना है कि यदि सरकार योजनाबद्ध तरीके से कोटेश्वर धाम का विकास करती है तो यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बनेगा, बल्कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी नई गति मिलेगी।
महाकाल उज्जैन से लगभग 80 किलोमीटर, धार से 40 किलोमीटर, भैंसोला से 14 किलोमीटर तथा लेबड़-नयागांव फोरलेन पर कानवन से 12 किलोमीटर दूर विंध्याचल की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित कोटेश्वर महादेव धाम सदियों से लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। इसकी प्राचीनता का उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के साथ ही चार वेदों में से यजुर्वेद और सामवेद में भी मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के चरण इस भूमि पर पड़े थे, जबकि यह सिद्ध संत सुकाल भारती की तपोभूमि भी रही है। प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक विरासत से समृद्ध होने के बावजूद यह प्राचीन तीर्थ आज भी पर्यटन के मानचित्र पर अपेक्षित पहचान पाने की प्रतीक्षा कर रहा है।
रुक्मिणी हरण के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने किया था विश्राम
लोकमान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण जब रुक्मिणी हरण के बाद कुंदनपुर (वर्तमान अमझेरा क्षेत्र) की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने कोटेश्वर में विश्राम किया और स्वयं ओंकार स्वरूप शिवलिंग की स्थापना कर पूजन किया। यही कारण है कि यह स्थान श्रीकृष्ण की चरणरज से पावन माना जाता है। तीर्थ के संस्थापक संत सुकाल भारती ने यहां कठोर तपस्या की तथा विक्रम संवत 551 में यहीं समाधि ली। आज भी यहां 11 सिद्ध संतों की जीवित समाधियां श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं।
1980 से पुरातत्व विभाग के संरक्षण में
कोटेश्वर परिसर में स्थित भूमिज शैली का प्राचीन धर्मस्व मंदिर 14 वीं शताब्दी की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। वर्ष 1980 में पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित कर अपने अधीन ले लिया। यहां पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित प्रसिद्ध हिंगलाज माता मंदिर की तरह हिंगलाज माता का प्राचीन मंदिर भी श्रद्धा का केंद्र है। करीब 1530 वर्षों से यहां प्रत्येक कार्तिक पूर्णिमा पर पांच दिवसीय विशाल मेले का आयोजन होता आ रहा है।
देश का अद्वितीय स्वयंभू शिव पंचायतन
कोटेश्वर धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित प्राकृतिक स्वयंभू शिव पंचायतन है। गुफा के भीतर भगवान विष्णु, सूर्य, देवी, गणेश तथा मध्य में स्वयंभू कोटेश्वर महादेव विराजमान हैं। विद्वानों के अनुसार इस स्वरूप का शिव पंचायतन अन्य किसी शिवालय में दुर्लभ है। श्रावण मास में पांचों प्रहर विशेष पूजन-अर्चन एवं धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं
वर्ष 2023 में यहां आयोजित पंडित प्रदीप मिश्रा की पंचपुष्प शिवमहापुराण कथा के बाद कोटेश्वर धाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। धाम के आसपास लगभग 50 हेक्टेयर सामाजिक वानिकी क्षेत्र, विंध्याचल की हरित पहाड़ियां, प्राकृतिक जलधाराएं और गुफाएं इसे धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ प्राकृतिक पर्यटन के लिए भी उपयुक्त बनाती हैं। हिंगलाज माता मंदिर के नीचे बहने वाले नाले पर जल संरचना विकसित कर नौकायन और अन्य पर्यटन गतिविधियां भी प्रारंभ की जा सकती हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर दीपों से जगमगाता कुंड और श्रावण मास में उमड़ने वाली कांवड़ यात्राएं यहां की विशेष पहचान हैं।
22 वर्षों से निरंतर चल रहा अखंड कीर्तन
कोटेश्वर धाम में 19 मई 2002 से लगातार 24 घंटे हरे राम-हरे कृष्ण का अखंड कीर्तन चल रहा है। आसपास के 31 गांवों के श्रद्धालु बारी-बारी से यहां आकर कीर्तन करते हैं। रात के सन्नाटे में गूंजती रामधुन पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर कर देती है।
महाकाल लोक के बाद बढ़ी श्रद्धालुओं की संख्या
महाकाल लोक बनने के बाद गुजरात सहित पश्चिम भारत से उज्जैन आने वाले अनेक श्रद्धालु कोटेश्वर धाम पहुंचकर दर्शन-पूजन करने लगे हैं। यहां समय-समय पर श्रीमद्भागवत कथा, महारुद्र यज्ञ एवं अन्य धार्मिक आयोजन होते रहते हैं, जिनमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि कोटेश्वर धाम को व्यवस्थित धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए तो क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ मिलेगा।