स्वराज्य, सूचना और साख का संकट: मुख्यधारा बनाम स्वतंत्र मीडिया का महामंथन
भारतीय लोकतंत्र और वैश्विक जनमानस इस समय सूचनाओं के एक अभूतपूर्व भंवर से गुजर रहा है। सूचना क्रांति ने जहाँ एक ओर ज्ञान के दरवाज़ों को आम आदमी के लिए खोल दिया है, वहीं दूसरी ओर सत्य और प्रपंच के बीच की धुंधली होती रेखा ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को गहरे वैचारिक संकट में ला खड़ा किया है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सच कह रहा है और कौन झूठ, बल्कि मूल प्रश्न यह है कि सूचनाओं के इस विशाल बाज़ार में ‘विश्वसनीयता’ का मालिक कौन है? क्या दशकों पुरानी विरासत वाली ‘मुख्यधारा मीडिया’ (Legacy Media) अब प्रासंगिक बची है, या ‘स्वतंत्र मीडिया’, ‘इन्फ्लुएंसर्स’ और रील्स की दुनिया ने उस स्थान को पूरी तरह हथिया लिया है?
# विरासत बनाम स्वायत्तता: सत्ता, संपदा और स्वतंत्रता का द्वंद्व
इतिहास गवाह है कि मुख्यधारा का मीडिया कभी लोकतंत्र का पहरेदार और जनहित का मुखपत्र हुआ करता था। बड़े समाचार-कक्ष (Newsrooms), अनुभवी संपादक, विधिक दल (Legal teams) और संस्थागत स्मृति इस व्यवस्था की ताकत थे। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था कॉर्परट घरानों, विज्ञापनों की निर्भरता और राजनीतिक सत्ता के प्रभाव तले घुटती चली गई। ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ की अंधी दौड़, टीआरपी की गुलामी और सनसनीखेज प्रस्तुति ने मुख्यधारा के मीडिया को जनहित के प्रहरी से बदलकर एक ‘कमर्शियल प्रोडक्ट’ बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जनता का विश्वास इस संस्था से तेजी से डिगने लगा।
इस रिक्तता से जन्म हुआ ‘स्वतंत्र मीडिया’ का। यूट्यूब, सबस्टैक, पॉडकास्ट और डिजिटल पोर्टल्स के माध्यम से उभरे इन नए पत्रकारों ने उन दबे-कुचलों और अनकहे मुद्दों को मंच दिया, जिन्हें मुख्यधारा ने सुनियोजित तरीके से हाशिए पर धकेल दिया था। इनकी सबसे बड़ी ताकत इनकी चुस्ती, वैचारिक स्वतंत्रता और बिना किसी कॉर्पोरेट फिल्टर के सीधी बात कहने का साहस है। लेकिन यह सिक्का भी खोटा हो सकता है; वित्तीय असुरक्षा, सनसनी का मोह और वैचारिक दुराग्रह कई बार स्वतंत्र पत्रकारों को भी उसी पाखंड के दलदल में धकेल देता है, जिसके खिलाफ वे आवाज़ उठाते हैं।
# प्रायोजित चरित्र-हनन और मुख्यधारा का रसातल: ‘रिमोट कल्चर’ का पर्दाफाश
जब मुख्यधारा का मीडिया अपनी संस्थागत मर्यादाओं को ताक पर रखकर टीआरपी और वैचारिक पूर्वाग्रहों के दलदल में उतर आता है, तब उसका पतन एक राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन जाता है। हाल ही में मुख्यधारा के एक प्रतिष्ठित कहे जाने वाले राष्ट्रीय चैनल (ABP News) द्वारा लोक गायिका नेहा सिंह राठौर के विरुद्ध एक गर्ल्स हॉस्टल में सेक्स रैकेट संचालित होने जैसी अत्यंत भ्रामक, मनगढ़ंत और चरित्र-हनन करने वाली खबर का ऑन-एयर प्रसारण किया जाना, इस बात का सबसे जीवंत और भयावह प्रमाण है कि हमारा सूचना तंत्र किस हद तक गिर चुका है।
यह घटना मात्र एक ‘संपादकीय भूल’ या तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि यह उस सुनियोजित और विकृत सांठगांठ का नग्न सत्य है जहाँ रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में होता है और स्क्रीन पर मुखौटे कोई और पहने खड़े होते हैं। जब सत्ता या व्यवस्था से तीखे और तार्किक सवाल पूछने वाली आवाज़ों को वैचारिक तर्कों से परास्त नहीं किया जा सकता, तब उन्हें सामाजिक और मानसिक रूप से तोड़ने के लिए उनके व्यक्तिगत चरित्र को निशाना बनाया जाता है। यह तानाशाही का वह मनोवैज्ञानिक हथियार है जिसका उद्देश्य समाज के बाकी हज़ारों लोगों में यह खौफ पैदा करना है कि यदि तुमने सवाल उठाया, तो तुम्हारी इज्जत और साख का सरेआम तमाशा बना दिया जाएगा।
जब इस प्रायोजित षड्यंत्र के खिलाफ भारी जन-आक्रोश फूटा और कानूनी कार्रवाई की तलवार लटकी, तब चैनल ने खानापूर्ति करते हुए एक साधारण सा ‘माफीनामा’ या खेद प्रकट कर दिया। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कुछ सेकंड के माफीनामे से किसी की प्रतिष्ठा, उसके परिवार और समाज में उसकी वर्षों की मेहनत से बनाई गई छवि की भरपाई हो सकती है? यह ‘माफी-संस्कृति’ (Apology Culture) अपराधियों को बिना किसी कठोर दंड के बचा निकलने का एक सुरक्षित गलियारा बन चुकी है। ऐसे मामलों में केवल औपचारिकता भरे माफीनामे से काम नहीं चल सकता, बल्कि इस प्रकार के प्रायोजित झूठ और चरित्र-हनन के कुकृत्यों के लिए चैनलों के संपादकों, मालिकों और इसके पीछे के असली सूत्रधारों पर भारी-भरकम मानहानि के मुकदमे, लाइसेंस निलंबन और कठोर दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए।
# मीडिया के भीतर का ‘कचरा’ कौन साफ कर रहा है?
कभी मीडिया संस्थानों के भीतर ‘लोकपाल’ (Ombudsman) और आंतरिक नैतिक समितियां हुआ करती थीं जो गलत खबरों पर अंकुश लगाती थीं। आज वह आंतरिक प्रणाली लगभग मृतप्राय हो चुकी है। ऐसे में, मीडिया के भीतर के ‘कचरे’ (Rot) को साफ करने का काम अब बाहरी, अराजक और क्राउड-सोर्स्ड (जनसमर्थित) ताकतों के हाथ में चला गया है।
* जनता की डिजिटल अदालत: आज सोशल मीडिया पर ‘कम्युनिटी नोट्स’ जैसी प्रणालियां, डिजिटल sleuths और सजग नागरिक किसी भी झूठी खबर या प्रोपेगैंडा की हवा कुछ ही घंटों में निकाल देते हैं। झूठ के पैर अब बहुत लंबे नहीं टिकते।
* आर्थिक दंड: चूँकि स्वतंत्र और डिजिटल मीडिया सीधे पाठकों या दर्शकों के समर्थन (Subscriptions/Donations) पर जीवित है, इसलिए यदि कोई पत्रकार या संस्थान अपनी साख खोता है, तो उसका आर्थिक बहिष्कार होने में देर नहीं लगती। जनता ही अब न्यायाधीश है और जनता ही जल्लाद।
* प्रतिक्रिया का विरोधाभास (Counter-Rot): विडंबना यह है कि मुख्यधारा के भ्रष्टाचार को साफ करने उतरी यह नई डिजिटल व्यवस्था कई बार खुद एक नया प्रदूषण पैदा कर रही है—क्लिकबेट (Clickbait) का लालच, छिपे हुए प्रायोजन (Hidden sponsorships), और नफरत के बाजार में बिकने वाली टीआरपी।
# रेखाओं का विलोपन: पत्रकार, क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर की एक ही श्रेणी
अब वह दौर लद गया जब ‘पत्रकार’ होने के लिए किसी प्रेस पास, संस्थागत डिग्री या किसी बड़े अखबार के मुहर की आवश्यकता होती थी। आज कार्ड-लेकर चलने वाले पत्रकार, स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और इंस्टाग्राम-रील क्रिएटर के बीच की सीमाएं पूरी तरह मिट चुकी हैं।
आज के दौर में मुख्यधारा के बड़े-बड़े एंकर और पत्रकार खुद एक ‘इन्फ्लुएंसर’ बन चुके हैं, जो अपने निजी ब्रांड को भुनाने में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर, जीवनशैली, तकनीक या वित्त (Finance) पर बात करने वाले सामान्य क्रिएटर्स को उनकी जनता ने भू-राजनीति, चुनाव और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर बोलने के लिए विवश कर दिया है। आज प्रभाव (Reach) और प्रसिद्धि ही नए ज़माने की साख बन चुकी है। जब मीडिया संस्थान प्रायोजित सुपारी की तरह काम करने लगते हैं, तब जनता इन पारंपरिक सीमाओं को पूरी तरह खारिज कर वैकल्पिक और स्वतंत्र आवाज़ों की तरफ देखने लगती है।
# साख का नया पैमाना और लोकतंत्र की अनिवार्यता
पत्रकारिता कोई पेशा भर नहीं, समाज की अंतरात्मा का आईना है। आज जब लाइनों का यह भ्रम और साख का यह संकट अपनी पराकाष्ठा पर है, तब मीडिया का भविष्य किसी बड़े कॉर्पोरेट लोगो या यूट्यूब के सब्सक्राइबर काउंट पर निर्भर नहीं करेगा।
आने वाले समय में प्रामाणिकता केवल उस व्यक्ति की बचेगी जो ‘रसीदें दिखाने’ (Showing receipts), अपनी भूल सुधारने (Corrections) की ईमानदारी और विश्लेषण तथा रिपोर्टिंग के बीच की सीमा को स्पष्ट रखने का साहस दिखाएगा। जनता अब मूर्ख नहीं है; वह जानती है कि कहाँ सूचना है और कहाँ प्रायोजित प्रपंच। लोकतंत्र को बचाने की इस जंग में पारदर्शिता ही एकमात्र वह अस्त्र है, जो मीडिया के भीतर के इस सड़ते फंगस को हमेशा के लिए साफ कर सकता है। जब तक लोकतंत्र में इन प्रायोजित प्रोपोगैंडा चैनलों के खिलाफ एक बड़ी न्यायिक और सामाजिक मिसाल कायम नहीं होगी, तब तक साख का यह संकट गहराता रहेगा।
