लोकतंत्र का प्राणः सत्ता परिवर्तन, असहमतियाँ और प्रतिरोध का संवैधानिक विवेक
“लोकतंत्र का सबसे बड़ा गहना सहमति नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने का उसका अधिकार है।”
समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन की गूँज केवल एक चुनावी जुमला मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के वैचारिक, राजनीतिक और नागरिक पटल पर एक गहरे मंथन का विषय बन चुकी है। वर्तमान सत्ताधारी दल और उसके वैचारिक अनुषांगिक संगठन जिस प्रकार से सरकार विरोधी आंदोलनों और राजनीतिक विरोध को ‘राष्ट्रविरोधी’ या ‘अराजकता’ की श्रेणी में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, वह भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी चरित्र और उसकी आत्मा पर एक गंभीर वैचारिक प्रश्नचिह्न लगाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह मूल तासीर है कि जनता ही शासन की मालिक होती है। संविधान प्रदत्त अधिकारों के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता से सवाल पूछना, उसकी विफलताओं पर क्षोभ प्रकट करना और आवश्यकता पड़ने पर लोकतांत्रिक चुनावों या वैधानिक आंदोलनों के माध्यम से ‘रिजीम चेंज’ की मांग करना किसी भी नागरिक का जन्मसिद्ध और संवैधानिक अधिकार है। जब राजनेता या विचारक इस स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया को बाहरी ताकतों या विध्वंसक षड्यंत्रों से जोड़कर देखने लगते हैं, तब वे अनजाने में ही उस लोकतांत्रिक बहुलता को कमज़ोर करते हैं, जिस पर देश की एकता और अखंडता की नींव टिकी हुई है।
# वैचारिक तुलनाः यूरोप के हिंसक संघर्ष और भारत का अहिंसक सत्याग्रह
यह देखना प्रासंगिक होगा कि अंतरराष्ट्रीय फलक पर इस समय किस प्रकार के जन-असंतोष का ज्वार उठ रहा है। फ्रांस, इटली, जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल, ग्रीस और अल्बानिया जैसे यूरोपीय देशों में आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ तीव्र और कई बार हिंसक विरोध-प्रदर्शन देखने को मिले हैं। अल्बानिया में अदालतों पर हमले की नौबत आई, तो फ्रांस में शिक्षकों और छात्रों का जनसैलाब सड़कों पर उतरा। इटली और जर्मनी में भी युवा वर्ग और श्रमिक वर्ग आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं।
इन देशों में जहाँ सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान और कानून-व्यवस्था के संकट के कारण सरकारें इन्हें कोरा उपद्रव मान रही हैं, वहीं भारतीय परिदृश्य इसके बिल्कुल विपरीत है। भारत की आम जनता ने तमाम आर्थिक दबावों, महँगाई और प्रशासनिक उपेक्षा के बावजूद जिस अभूतपूर्व संयम, धैर्य और अहिंसक प्रतिरोध का परिचय दिया है, वह महात्मा गांधी की उस विरासत का जीवंत प्रमाण है जहाँ विरोध का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि नैतिक बल होता है। जंतर-मंतर से लेकर देश के विभिन्न कोनों तक हुए प्रदर्शनों में जिस प्रकार दिल्ली पुलिस और प्रशासन द्वारा दमनकारी नीतियों का सामना करना पड़ा है, उसके बाद भी जनता का शांति के मार्ग पर अडिग रहना यह साबित करता है कि भारतीय नागरिक अपनी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को लेकर पूरी तरह सजग है।
# संस्थागत शुचिता और पारदर्शिता की अनिवार्यता
लोकतंत्र केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर दिन की जवाबदेही मांगता है। वर्तमान में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनके मूल में चुनावी शुचिता, निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े गंभीर सवाल हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया, निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और हालिया चुनावी विवादों पर उठ रहे प्रश्नों का संतोषजनक समाधान होना निहायत जरूरी है। जब तक सरकार इन संस्थागत विसंगतियों और एसआईआर (विशेष जाँच रिपोर्ट या संबंधित चुनावी सुधार) जैसे मुद्दों पर खुलकर पारदर्शी संवाद स्थापित नहीं करती, तब तक जनता और विपक्ष का सड़कों पर उतरना स्वाभाविक है।
संसदीय लोकतंत्र की गरिमा इसी में है कि कार्यपालिका संसद के पटल पर विपक्ष और जनता के सवालों से भागे नहीं। जुलाई से लेकर अक्टूबर तक के घटनाक्रम में जिस प्रकार गृह मंत्रालय और सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने नीतिगत और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर मौन साधे रखा या उचित मंच पर उत्तर देने से परहेज किया, उसने अविश्वास के उस कुहासे को और गहरा किया है जो आज असंतोष की चिंगारी बनकर फूट रहा है। यदि संसद के भीतर तर्कों और उत्तरों का रास्ता खुला रहे, तो सड़कों के संघर्ष की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी।
# महात्मा गांधी का सत्याग्रह और आज का भारतीय नागरिक
महात्मा गांधी ने 1920 में हंटर कमेटी के सामने स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया था कि यदि कोई बहुमत से चुनी हुई सरकार भी निरंकुश, अन्यायपूर्ण या जनविरोधी हो जाती है, तो उसके खिलाफ सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा करना नागरिकों का पवित्र नैतिक कर्तव्य बन जाता है। कानून की सजा को स्वेच्छा से स्वीकार करते हुए सत्ता पर नैतिक दबाव बनाना ही सच्चे लोकतंत्र की रक्षा का मार्ग है। आज हिंदुस्तान का आम आदमी ठीक इसी राह पर चल रहा है।
अतः, ‘रिजीम चेंज’ और प्रतिरोध को अपराध या राष्ट्रद्रोह की नजर से देखना लोकतंत्र की मूल भावना के साथ न्याय नहीं है। यह समय सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए आत्मમंथन का है कि वे जनता की आवाज़ को दबाने के बजाय उसकी सुने।
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“सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ सत्ता को जनता का भय हो, न कि जनता को सत्ता का।”
