ब्यरो चीफ सुन्दरलाल जिला सोलन,
जल ही जीवन है, इसे प्रत्येक प्राणी समझता है, मगर ऐसे बिरले ही होते हैं, जो इसके मोल को समझते हैं और इसे व्यर्थ बहने से बचाते हैं । ऐसे ही एक इंसान हैं जिन्होंने न केवल इसके मोल की पहचाना ,बल्कि इसको व्यर्थ होने से बचाने के लिए ऐसी तकनीक विकसित की जिससे वर्षा के जल को बेकार बहने से बचाकर इसका सद्पयोग हो सके । कसौली तहसील की ग्राम पंचायत के कोट बेजा के ग्रांम रल्लीरुग के डॉक्टर अरुण सूद ने कृषि वैज्ञानिकों से प्रेणा लेकर वर्षा के जल को बचाने के लिए ऐसी तकनीक बनाईं है जिससे दैनिक जीवन के क्रियाकलापों के लिए इस जल का प्रयोग किया जा सकता है ।अपने अनुभवों को सांझा करते हुए डॉ अरूण सूद बताते हैं जल का संकट दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है और यह संकट कम होने बजाय ओर बढेगा । उन्होंने कहा कि वनों का अधिक कटान होना और खाली जगहों में वृक्षारोपण न करना वनों को आग लगना इसकी मुख्य बजह है ।उन्होंने कहा कि आज समय आ गया है कि जब हम पानी की एक एक बूंद का संरक्षण करें तभी इस समस्या से निजात पा सकते हैं । डॉ अरुण सूद ने बताया कि जो वर्षा का पानी मकान की छतों से बहकर व्यर्थ चला जाता है उसे अगर हम टैंक बनाकर इकट्ठा कर लें तो उसे जरूरत के समय पर काम में लाया जा सकता है ।उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से सीख लेकर अपने जमीन के खेतों में वर्षा का पानी एकत्र करने के लिए एक तकनीक अपनाई है । उस तकनीक के बारे में डॉ अरुण सूद का कहना था कि हम ढलानदार जगहों से नदी नालों व वर्षा का पानी इकट्ठा कर बड़े बड़े टैंक बनाकर उसमें जमा कर सकते है तथा पोलोथिन की चादर ( तरपाल)से उस टैंक को पूरी तरह से ढककर उसमे पानी इकट्ठा कर सकते हैं । यह पानी यह पानी बड़ा लाभदायक पाया गया है ,जिसे कृषि व बागवानी के लिए कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है । उन्होंने बताया कि पक्के टेंक के मुकाबले यह बहुत ही सस्ता है और जब यह पानी इस्तेमाल के लिया जाये तो पोलोथिन को दूसरे कामो में प्रयोग किया जा सकता है ।जहां सीमेंट के बने टैंक के फटने व खराब होने की अधिक संभावना रहती है ,वहीं पोलोथिन का टैंक न फटता है और न सड़ता है तथा इसे बनाने में भी कम समय लगता हैं इसे खेतों में खाली जगह पर पांच ,छह फुट गहरा गड्डा खोदकर ऊपर से खुला रखकर बीच में पोलोथिन की चादर बिछा दी जाती हैं इससे पूर्व इस गड्ढे को कंकड़ पथर से पूरी तरह साफ कर देना चाहिए ।
अगर यह पूरी तरह से साफ नहीं होगा ,तो कंकड़ पथर उस चादर को खराब कर सकते हैं ।इस तरीके से हम पानी इकट्ठा कर सकते हैं । उन्होंने बताया कि बरसात में छोटे नालों से जो पानी बहता है उसको हम इस तरह से एकत्र कर सकते हैं ।तथा बाद में सिंच्चाई के लिए प्रयोग ला सकते हैं । डॉ अरुण सूद ने बताया कि पिछले कुछ वर्षो से वह इसी तरह वर्षा के पानी को व्यर्थ होने से बचा रहें हैं । जिसमें बेमौसमी सब्जियां तैयार करते हैं ।इसके साथ साथ बगीचों में मौसमी फलों की फसल अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं ।उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि आजकल मनरेगा स्कीम के तहत ऐसे टैंकों बनाने में भी सरकारी आर्थिक मदद लोग आसानी से प्राप्त कर सकते हैं