रिपोर्टर संतन दास मानिकपुरी
पति की मृत्यु के बाद बेघर हुई महिला को मिला अधिकार, 3 महीने में वापस मिली संपत्ति
जब अपने छोड़ गए साथ, तब न्याय की उम्मीद बनकर सामने आए पोखराज साहू
दर-दर भटक रही असहाय मां को मिला सहारा, संघर्ष की कहानी बनी समाज के लिए मिसाल
डेविड धीवर, जो ग्राम बोरियाकला (रायपुर) की रहने वाली हैं, उनकी जिंदगी वर्ष 2017 में उस समय पूरी तरह बदल गई जब एक वाहन दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु हो गई। पति के निधन के बाद जहां उन्हें सहारे की आवश्यकता थी, वहीं ससुराल पक्ष ने उन्हें और उनके मासूम बेटे को घर से बाहर निकाल दिया। आरोप है कि इसी दौरान उनकी संपत्ति पर भी कब्जा कर लिया गया।
समाज, रिश्तेदारों और यहां तक कि मायके पक्ष से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने पर डेविड लगातार 8 वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष करती रहीं। अपनों से उपेक्षा और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने बेटे का पालन-पोषण स्वयं किया।
इसी दौरान उनकी बचपन की सहेली दिव्या ध्रुव ने उन्हें वैष्णवी ज्योतिष संस्थान के संस्थापक पोखराज साहू, जो ग्राम बहेरापाल के निवासी हैं, उनसे मिलने की सलाह दी।
बताया जाता है कि जब डेविड अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुंचीं, तब पोखराज साहू ने पूरे मामले को गंभीरता से समझा और वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से समाधान का मार्ग बताया। स्थानीय लोगों के अनुसार वे विभिन्न सामाजिक और व्यक्तिगत मामलों में लोगों को मार्गदर्शन देने के लिए जाने जाते हैं।
सबसे भावुक पहलू यह रहा कि जब डेविड के मायके पक्ष से भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, तब वैष्णवी ज्योतिष संस्थान राजिम के संस्थापक पोखराज साहू ने संस्था के सदस्यों की सहमति से अपने संस्था के जनकल्याण के लिए निकाले फंड से न्यायालय प्रक्रिया में आने वाले खर्चों में सहयोग किया और पूरे मामले में लगातार मार्गदर्शन देते रहे।
इस प्रकरण में राजिम के अधिवक्ता हिमांशु दुबे की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने लंबे समय से लंबित मामले को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत कर कानूनी प्रक्रिया को मजबूती दी। इसके बाद न्यायालयीन प्रक्रिया के माध्यम से मात्र तीन महीनों के भीतर डेविड और उनके बेटे को उनकी संपत्ति वापस दिलाई गई, जिससे उनकी आजीविका का रास्ता फिर से खुल सका।
8 वर्षों तक संघर्ष और कठिन परिस्थितियों का सामना करने वाली डेविड के लिए यह जीत केवल संपत्ति वापस मिलने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आत्मसम्मान, साहस और न्याय की जीत बन गई।
“जब दुनिया ने छोड़ा साथ, तब इंसानियत बनकर आगे आए पोखराज साहू”
“हर युग में अन्याय के खिलाफ कोई न कोई अवश्य खड़ा होता है — यह घटना उसी का उदाहरण है।”