सुकुमाल स्वामी की कथा से दिया वैराग्य और आत्मकल्याण का संदेश
512 अर्घ्य समर्पित कर श्रद्धालुओं ने की सिद्ध परमेष्ठी की आराधना
आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के सान्निध्य में सिद्धचक्र महामंडल विधान का सातवां दिन
बड़ौत। मंडी बड़ौत स्थित अजितनाथ सभागार में आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ के पावन सान्निध्य में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन श्रद्धालुओं ने 512 अर्घ्य समर्पित कर सिद्ध परमेष्ठी की आराधना की। जिनाभिषेक, शांतिधारा, पूजन और संगीतमय भक्ति के बीच धर्ममय वातावरण बना रहा।
प्रातःकाल जिनाभिषेक एवं शांतिधारा के बाद जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना की गई। विधानाचार्य पं. सनत कुमार जैन एवं पं. विनोद कुमार जैन के निर्देशन में धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। संघस्थ बहिन इंजी. ऋषिका दीदी ने गुरु पूजन कराया। संतोष म्यूजिकल ग्रुप की भक्ति प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर किया।
सुकुमाल स्वामी की कथा से समझाया वैराग्य का महत्व
आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने सुकुमाल स्वामी की कथा के माध्यम से संसार की क्षणभंगुरता, त्याग और वैराग्य का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि सांसारिक वैभव और सुख-सुविधाएं स्थायी नहीं हैं। मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
आचार्य श्री ने बताया कि वैराग्य केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि मन से राग-द्वेष, अहंकार और कषायों को कम करना भी है। आत्मचिंतन, संयम और तपस्या से ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। संसार के आकर्षणों में उलझने के बजाय आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए।
आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है सिद्धचक्र विधान
आचार्य श्री ने कहा कि जिनेंद्र भगवान और सिद्ध परमेष्ठी के गुणों का स्मरण आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है। अर्घ्य समर्पण तभी सार्थक है, जब उसके साथ श्रद्धा, विनय, संयम और सदाचरण का भाव भी जुड़ा हो। धर्माराधना का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि धर्म के सिद्धांतों को जीवन में अपनाना है। अहिंसा, संयम और सदाचार के माध्यम से राग-द्वेष को कम करना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि विधान में प्रतिदिन श्रद्धालु उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं। श्री 1008 अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी, मंडी बड़ौत के तत्वावधान में आयोजित यह विधान 8 से 15 अक्टूबर 2026 तक चल रहा है। तमिलनाडु सहित विभिन्न नगरों एवं आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।