बाहरी संसार की खोज में सफल विज्ञान आत्मा को नहीं पहचान पाया, आत्मकल्याण के लिए अंतर्मुखी होना आवश्यक
देवली से मुकेश जैन।
देवली। महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभसागर जी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन को आत्मतत्त्व की खोज का विज्ञान कहा जा सकता है। आज का विज्ञान जड़ पदार्थों की खोज में लगा है, जबकि जैन दर्शन आत्मा की खोज का मार्ग बताता है।
मुनिश्री ने कहा कि जड़ पदार्थों की खोज करने वाली चेतन आत्मा ही उनका उपयोग करती है, लेकिन स्वयं को पहचान नहीं पाती। विज्ञान ने बाहरी संसार की खोज में अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं, परंतु आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए बाहरी खोज से हटकर भीतर की ओर देखने की आवश्यकता है। आत्मज्ञान ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में लोग धर्म को उलझन और संसार को अच्छा मानते हैं, जबकि आचार्य कहते हैं कि धर्म संसार की सारी उलझनों को दूर कर सुख और शांति प्रदान करता है। धर्म हार्दिक शांति का साधन है, लेकिन मनुष्य दुखों के भय से उपजने वाली कठिन परिस्थितियों से घबराकर सांसारिक प्रपंचों में उलझा रहता है।
उन्होंने कहा कि भव्य जीव निर्मल भावों से जिनेंद्र भगवान की वंदना करते हैं और अपने पाप कर्मों के बंधनों को काटने का प्रयास करते हैं। भगवान का हृदय धर्मरूपी अमृत से भरे मेघों के समान है, जो भव्य जीवों को संसार के दुखों से उबारकर अजर-अमर पद की प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए मनुष्य को जिनेंद्र भगवान के चरणों में नमन कर धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।