न्याय और सत्ता की लक्ष्मण रेखा: अंकिता भंडारी प्रकरण और राजधर्म का अवमूल्यन
भारतीय गणराज्य की आधारशिला केवल कागजी अनुच्छेदों या संवैधानिक अनुपालन पर नहीं, बल्कि उस नैतिक अनुबंध पर टिकी है जो राज्य को अपने हर नागरिक की जीवन और गरिमा की रक्षा के लिए बाध्य करता है। अंकिता भंडारी का बहुचर्चित प्रकरण केवल एक साधारण आपराधिक वारदात या कानून-व्यवस्था की विफलता का स्थानीय प्रसंग मात्र नहीं है, बल्कि यह समकालीन भारतीय राजनीति, संवैधानिक नैतिकता, राज्य मशीनरी के चरित्र और मानवाधिकारों की वर्तमान दशा पर एक अत्यंत गंभीर प्रश्नचिह्न है। जब एक उन्नीस वर्ष की निर्बल, साधनहीन युवती अपनी आजीविका की तलाश में श्रम करती है और राज्य के सत्ता-संरक्षित रसूखदार तत्वों की यौन पिपासा का शिकार बनने से इंकार करने पर अपनी जान गंवा बैठती है, तो यह घटना भारतीय समाज के पितृसत्तात्मक ताने-बाने और राजकीय संरक्षण के पाखंड को पूरी तरह बेनकाब कर देती है।
# संवैधानिक और विधिक परिप्रेक्ष्य: न्याय की अधूरी परिधि और संस्थागत विडंबना
भारतीय संविधान का अनुच्छेद २१ प्रत्येक नागरिक को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसके साथ ही, लैंगिक न्याय, कार्यस्थल पर गरिमा और अपराधों की निष्पक्ष जांच व अभियोजन राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) तथा आपराधिक न्याय प्रणाली की बुनियादी शर्त हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड में उत्तराखंड की विशेष जांच दल (SIT) द्वारा मुख्य आरोपियों को सजा दिलाया जाना न्यायिक प्रक्रिया का एक चरण तो है, किंतु यह न्याय की मु मुक्षु पिपासा को पूर्णतः शांत नहीं करता।
कानून का शासन (Rule of Law) यह मांग करता है कि संदेह के दायरे में आने वाले हर व्यक्ति, चाहे उसका राजनीतिक कद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, की संलिप्तता की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच हो। इस प्रकरण में एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती के खिलाफ गंभीर आरोप लगने, एफआईआर दर्ज होने और तत्पश्चात बिना किसी न्यायिक या साक्ष्यात्मक स्पष्टीकरण के उन्हें संवैधानिक पद (राज्यपाल) पर आसीन कर देना विधिक शून्यता और शक्ति के दुरुपयोग का ज्वलंत उदाहरण है। संवैधानिक पदों की गरिमा इस बात की मांग करती है कि पद पर बैठने वाला व्यक्ति निष्कलंक हो। जब संदेह के घेरे में मौजूद किसी पात्र को उच्च संवैधानिक पीठ या राजभवन की शोभा बना दिया जाता है, तो यह न्यायपालिका की सर्वोच्चता और आपराधिक न्याय तंत्र के निष्पक्षता के सिद्धांत पर सीधा आघात करता है।
# लोकतांत्रिक और राजनीतिक विमर्श: अहंकार, संवेदनशीलता का अभाव और जन-आकांक्षाएं
लोकतंत्र की मूल आत्मा लोक-लाज और जनता के प्रति उत्तरदायित्व में निहित है। महान दार्शनिकों और हमारे संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे राज्य की कल्पना की थी जहाँ सत्ताधीश स्वयं को जनता का सेवक समझें, न कि प्रजा का शासक। किंतु वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जिस प्रकार सत्ता के शीर्ष पर बैठे राजनेताओं द्वारा लोक-आकांक्षाओं, विरोध के स्वरों और पीड़ित माता-पिता की जायज मांगों को दुत्कारे जाने की प्रवृत्ति विकसित हुई है, वह एक स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए घातक है।
जब अंकिता के माता-पिता अपनी बेटी को न्याय दिलाने, उच्चस्तरीय सीबीआई जांच की मांग करने और राजनीतिक संलिप्तता के गहरे तंतुओं को खंगालने के लिए देश की राजधानी के हृदय स्थल इंडिया गेट पर शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठते हैं, तो राज्य की प्रतिक्रिया संवाद के बजाय दमन के रूप में सामने आती है। आधी रात के बाद और भोर के सन्नाटे में पुलिस बल का प्रयोग कर एक शोक संतप्त मां और संघर्षरत पिता को हिरासत में लेना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता अब जन-संवेदनाओं से पूरी तरह कट चुकी है। यह लोकतांत्रिक असहशीलता का वह पैमाना है जहाँ सवाल पूछने वाले को अपराधी और सत्ता के गलियारों में बैठे संदिग्धों को संरक्षण देना व्यवस्था का अघोषित नियम बन चुका है।
# मानवाधिकार और नारी सशक्तिकरण: नारों की राजनीति बनाम धरातलीय हकीकत
एक ओर देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के भव्य विज्ञापनों और सांस्कृतिक आयोजनों में नौ देवियों की आराधना के माध्यम से स्त्री-शक्ति के सम्मान के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर धरातल पर गरीब और वंचित वर्ग की बेटियों की अस्मिता और जीवन की रक्षा करने में पूरा तंत्र विफल नजर आता है। नारी सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल प्रतीकात्मक पूजा या चुनावी नारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उस सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से है जो एक महिला को भयमुक्त होकर जीने का अधिकार दे।
अंकिता भंडारी ने अपनी गरीबी को अपनी देह के शोषण का सौदा नहीं बनने दिया। उसका यह प्रतिकार भारतीय नारी के अदम्य आत्मसम्मान और स्वाभिमान का सर्वोच्च प्रतीक है। परंतु विडंबना यह है कि जिस समाज और व्यवस्था को उसकी इस गरिमा की रक्षा करनी चाहिए थी, उसी व्यवस्था के रसूखदारों ने उसे मौत के मुंह में धकेल दिया। इसके बाद, जब उसके माता-पिता अपनी मृत बेटी के लिए इंसाफ की भीख मांगते हैं, तो उन्हें हर कदम पर प्रताड़ना, अपमान और सरकारी मशीनरी की क्रूरता का सामना करना पड़ता है। यह मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है, जो यह रेखांकित करता है कि सत्ता के अहंकार के आगे एक साधारण नागरिक के आंसू और उसका मानवाधिकार पूरी तरह महत्वहीन हो चुके हैं।
“बेटियों की अस्मिता पर नौ दिन व्रत रखने का पाखंड रचने वाली सियासत ने आज साबित कर दिया कि उसके लिए सत्ता का सिंहासन, न्याय की देहरी से कहीं अधिक पवित्र है!”