मुजफ्फरनगर में फर्जी रजिस्ट्रेशन का कथित खेल! डॉक्टर दानिश और उनके साथियों पर गंभीर आरोप, स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में
बिना जानकारी के डॉक्टरों के दस्तावेज इस्तेमाल करने का दावा, रजिस्ट्रेशन के नाम पर मोटी रकम लेने के आरोप; मीडिया के लगातार प्रयासों के बावजूद डॉक्टर दानिश का पक्ष नहीं आया सामने
मुजफ्फरनगर। जनपद में क्लीनिक और अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि शहर की कच्ची सड़क स्थित अपना हॉस्पिटल में कार्यरत डॉक्टर दानिश और उनके कुछ साथी कथित तौर पर स्वास्थ्य विभाग के कुछ कर्मचारियों से मिलीभगत कर क्लीनिक और अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन कराने का काम कर रहे हैं। इस पूरे मामले में फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल, योग्य चिकित्सकों के प्रमाणपत्रों के कथित दुरुपयोग और रजिस्ट्रेशन के नाम पर मोटी रकम वसूले जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
मामले से जुड़े पक्ष का दावा है कि यह गतिविधि लंबे समय से चल रही है। आरोप है कि अलग-अलग क्लीनिकों और अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन में ऐसे डॉक्टरों के शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, जिन्हें कथित तौर पर यह जानकारी तक नहीं है कि उनके नाम और प्रमाणपत्र किस संस्थान के रजिस्ट्रेशन में लगाए गए हैं।
यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह केवल रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय भी होगा।
जिन डॉक्टरों के दस्तावेज इस्तेमाल हुए, उन्हें ही जानकारी नहीं होने का दावा
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन चिकित्सकों के दस्तावेज कथित तौर पर रजिस्ट्रेशन में इस्तेमाल किए गए, उन्हें ही इसकी जानकारी नहीं होने की बात कही जा रही है।
सवाल यह है कि क्या संबंधित डॉक्टरों की सहमति ली गई थी? क्या उनके प्रमाणपत्रों का सत्यापन किया गया? क्या रजिस्ट्रेशन में दर्ज चिकित्सक वास्तव में संबंधित क्लीनिक या अस्पताल में मरीजों का इलाज कर रहे हैं?
आरोप यह भी है कि कुछ पंजीकृत क्लीनिकों और अस्पतालों में रजिस्ट्रेशन में दर्ज डॉक्टर मौजूद नहीं रहते। ऐसे में संबंधित संस्थानों का निरीक्षण कर यह जांचना जरूरी है कि वहां वास्तव में कौन चिकित्सक मरीजों का इलाज कर रहा है और उसकी शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय योग्यता क्या है।
रजिस्ट्रेशन के नाम पर मोटी रकम वसूले जाने का आरोप
इस प्रकरण में रजिस्ट्रेशन कराने के नाम पर मोटी रकम लिए जाने का दावा भी किया गया है। मामले से जुड़े पक्ष का कहना है कि कथित फर्जी रजिस्ट्रेशन और पैसों के लेन-देन से संबंधित साक्ष्य उसके पास मौजूद हैं।
यदि दस्तावेजों और भुगतान संबंधी साक्ष्यों की पुष्टि होती है, तो जांच में यह स्पष्ट हो सकता है कि रकम किसने ली, किसे दी गई और रजिस्ट्रेशन जारी कराने की प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही।
यह भी जांच का विषय है कि संबंधित रजिस्ट्रेशन के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ और क्या निर्धारित नियमों का पालन किया गया।
‘हमारा नेटवर्क बहुत बड़ा है’—सूत्रों के हवाले से दावा
इस मामले में सूत्रों के हवाले से एक और गंभीर दावा सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, डॉक्टर दानिश कथित तौर पर अपने नेटवर्क को बड़ा बताते हुए यह कहते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हालांकि, इस कथित बयान की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और डॉक्टर दानिश का प्रत्यक्ष रूप से सत्यापित बयान उपलब्ध नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, इस कथित नेटवर्क में स्वास्थ्य विभाग के कुछ लोगों की भूमिका होने की बात भी कही जा रही है। यदि ऐसा है, तो यह जांच का विषय है कि क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी ने नियमों की अनदेखी की अथवा रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को प्रभावित किया।
अब सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी इन आरोपों को गंभीरता से लेकर जांच कराएंगे? क्या संबंधित रजिस्ट्रेशन की फाइलों और दस्तावेजों की समीक्षा होगी? और यदि किसी स्तर पर मिलीभगत सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी?
मीडिया के सवालों से दूरी बना रहे डॉक्टर दानिश? लगातार संपर्क के बावजूद नहीं मिला जवाब
इस पूरे मामले में डॉक्टर दानिश का पक्ष जानने के लिए मीडिया कर्मियों द्वारा पिछले कई दिनों से लगातार संपर्क करने का प्रयास किया जा रहा है। आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने और उनका पक्ष सामने लाने के उद्देश्य से पत्रकारों ने फोन के माध्यम से बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन उनके अनुसार डॉक्टर दानिश ने फोन रिसीव नहीं किया।
इतना ही नहीं, मीडिया कर्मियों द्वारा कच्ची सड़क स्थित अपना हॉस्पिटल पहुंचकर भी डॉक्टर दानिश से मुलाकात करने और मामले पर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। हालांकि, पत्रकारों के मुताबिक, वहां भी डॉक्टर दानिश से मुलाकात नहीं हो सकी और आरोपों को लेकर उनका जवाब सामने नहीं आया।
मीडिया से जुड़े लोगों का यह भी दावा है कि डॉक्टर दानिश कुछ अन्य लोगों के संपर्क में हैं और उनसे बातचीत कर रहे हैं, जबकि पत्रकारों के बार-बार प्रयासों के बावजूद उनका जवाब नहीं मिल पा रहा है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब मामला रजिस्ट्रेशन, चिकित्सकों के दस्तावेजों और कथित वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है, तो संबंधित आरोपों पर डॉक्टर दानिश का पक्ष सामने आना क्यों जरूरी नहीं समझा जा रहा? फिलहाल, उनसे संपर्क करने के प्रयासों के बावजूद उनका आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं हो सका है। उनका जवाब मिलने पर उसे भी प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
इस पूरे प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। यदि किसी क्लीनिक या अस्पताल के रजिस्ट्रेशन में गलत दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ, तो उनका सत्यापन किस अधिकारी या कर्मचारी ने किया? क्या संबंधित डॉक्टर की सहमति और योग्यता की जांच की गई? क्या मौके पर जाकर संस्थान का निरीक्षण किया गया?
यदि किसी स्तर पर फर्जी दस्तावेजों, गलत जानकारी या अवैध भुगतान की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, संबंधित रजिस्ट्रेशन की वैधता की समीक्षा भी आवश्यक है।
अब निष्पक्ष जांच और कार्रवाई का इंतजार मुजफ्फरनगर में सामने आए इस मामले ने क्लीनिक और अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जरूरत है कि संबंधित संस्थानों के रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड, चिकित्सकों के प्रमाणपत्र, उनकी सहमति, मौके पर उनकी उपलब्धता और भुगतान संबंधी साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुजफ्फरनगर में क्लीनिक और अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन की आड़ में कोई संगठित गड़बड़ी हो रही है? क्या स्वास्थ्य विभाग के कुछ कर्मचारियों की भूमिका की जांच होगी? क्या बिना जानकारी के डॉक्टरों के दस्तावेज इस्तेमाल किए जाने के आरोपों की सच्चाई सामने आएगी? और यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो क्या जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर क्या कदम उठाते हैं और जांच के बाद किन तथ्यों का खुलासा होता है।
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