जेलों में कैदियों की यह ठूसमठूस कितनी बड़ी और व्यापक समस्या.
जेलों में जमी कैदियों की अनावश्यक भीड़ को कम करने के कदम उठाए जाने की जरूरत..!!
हमारे देश मे जेलें सिर्फ कैदियों की भीड़ से ही नहीं बल्कि कर्मचारियों की कमी से भी जूझ रही हैं!वहीं जेलों में कैदियों की स्वास्थ्य देखभाल के लिए नियुक्त होने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बहूत कम हैं यानी एक चिकित्साकर्मी पर लगभग ढाई सौ कैदियों की स्वास्थ्य जांच का भार है!पर्याप्त चिकित्सा के अभाव में बड़ी संख्या में कैदी शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार पड़ते हैं। गंभीर बीमारी की हालत और बेहतर चिकित्सा के अभाव में व अक्सर दम तोड़ देते हैं!हालांकि जेलों में दबाव को कम करने का यह एक तात्कालिक उपाय है, लेकिन धीरे-धीरे सरकार को ‘जेल सुधार’ की ओर भी कदम बढ़ाने की जरूरत है, ताकि कैदियों की संख्या को सीमित करने का मकसद पूरा हो जाए।
देखा जाये तो देश में जेल सुधार की बुनियाद न्याय व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण से जुड़ी है!भारतीय न्याय तंत्र खुद ही न्यायाधीशों की कमी को दूर करने और लंबित मामलों के निपटारे की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है! जब तक पर्याप्त जजों की नियुक्तियां नहीं की जाएंगी तब तक त्वरित न्याय की आस पूरी नहीं होगी।जब समय पर न्याय नहीं होगा तो जेलें विचाराधीन कैदियों से भरी रहेंगी! न्यायाधीशों की कमी से जूझ रही अदालतों में लंबित मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं!जिस पर गजब यह कि जेलों में मौजूद कुल कैदियों में से लगभग दो तिहाई कैदी विचाराधीन हैं यानी तो तिहाई फीसद कैदी ऐसे हैं जिनके मामलों में अभी कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ है लेकिन उनको भी जेल में रखा गया है इनमें तमाम कैदी निर्दोष भी हो सकते हैं साथ ही बहुत-से कैदी ऐसे भी हो सकते हैं जो अपने ऊपर लगे आरोप के लिए संभावित सजा की अधिकतम अवधि से अधिक समय जेल में बिता चुके हों!पर ऐसे लोगों का दर्द सुनने वाला कोई नहीं है।समझा जा सकता है कि जेलों में कैदियों की यह ठूसमठूस कितनी बड़ी और व्यापक समस्या है। इस समस्या से कैदी और कारागार दोनों की दुर्दशा हो रही है, जिसके समाधान की फिलहाल कोई संभावना नहीं दिखाई देती!किसी भी व्यवस्था पर जब उसकी क्षमता से अधिक भार डाल दिया जाता है तो वह अव्यवस्था में परिवर्तित हो जाती है। भारतीय जेलों की दुर्दशा का मूल कारण यही है। अब जिस जेल में उसकी क्षमता से अधिक कैदी रहेंगे तो स्वाभाविक रूप से उसकी खान-पान से लेकर सुरक्षा तक, सारी व्यवस्थाओं पर सीमा से अधिक बोझ पड़ेगा और परिणामस्वरूप ये व्यवस्थाएं चरमराने लगेंगी। यही कारण है कि अकसर जेल में खराब खाने से लेकर शौच आदि से संबंधित अव्यवस्थाओं की बातें सामने आती रहती हैं। उनमें कैदी नारकीय जीवन जी रहे हैं। स्थितिजन्य कारणों से आए दिन उनके बीच लड़ाई-झगड़े भी होते हैं। विभिन्न जेलों से कैदियों के संदिग्ध स्थितियों में मरने, उनके हंगामा मचाने और भागने की खबरें आती रहती हैं। इनके पीछे मूल वजह अव्यवस्था ही होती है। पर जेल अधिकारियों और कर्मचारियों का उत्पीड़न भरा व्यवहार भी कई बार ऐसी घटनाओं का कारण बनता है।कहना न होगा कि जेल सुधार की पहली सीढ़ी यही है कि न्यायिक प्रक्रिया को दुरुस्त किया जाए, जिससे कैदियों की ठूसमठूस भीड़ में कमी आए। इसके बाद ही जेल से संबंधित अन्य सुधारों पर बात करना उपयुक्त होगा।
रिपोर्ट रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़