रीवा जिले के कुछ सिपाही ऐसे नजर आते है जैसे थाना प्रभारी हो किससे किस तरह बात करें उनको ये भी नहीं पता पर वसूली जरूर जम कर करते है?
वह रिश्ता जो न पद देखता है, न परवाह करता है रुतबे की। वह भावना जो कठिन समय में दिल से दिल को जोड देती है। एक सच्चा मित्र वही होता है, जो ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ शब्द नहीं, अपना समय, अपना स्नेह, और अपनी उपस्थिति भी अर्पित करता है।
मध्यप्रदेश पुलिस के महानिदेशक श्री कैलाश मकवाना जी नेहाल ही में ऐसा ही उदाहरण प्रसतुत किया, जो केवल एक व्यक्तिंगत प्रसंग नहीं, बल्कि पूरे पुलिस परिवार और समाज के लिए एक भावनात्मक प्रेरणा बन गया है।
जब उनके बचपन के मित्र, एएसआई सुरेश उर्फ नुमान एक सडड़क दुर्टना में घायल होकर अस्पताल में र्त हुए, तब डीजीपी जैसे व्यस्ततम पद पर होने के बावजद मकवाना साहब स्वयं अस्पताल पहुँचे। उनका ‘आगमन कोई औपचारिकता नहीं थी – वह एक सच्चे मित्र की आत्मीयता थी, जो न किसी कैमरे की तलाश में थी, न वाहवाही की चाह में।
जब उन्होंने अपने मित्र के गाल पर हाथ फेरा, तो वह क्षण किसी ‘औपचारिक मुलाकात का नहीं, बल्कि आत्मिक जुड़ाव का था। सुरेश जी की आँखों में उमड़़ते भाव, और मकवाना जी की आँखों में छलकता अपनापन – दोनों ने यह सिद्ध कर दिया कि रिश्तों से बड़ा कोई पद नहीं होता।
हम जिस युग में हं, वहाँ अक्सर यह देखा जाता है कि जब तक व्यक्ति किसी पद पर होता है, तब तक समाज और भीड़ उसका अनुसरण करती है। परंतु जैसे ही वह पद छिनता है, मानो मान-सम्मान भी छिन जाता है। लेकिन सादगी और इंसानियत वे मूल्य हैं, जो किसी कुर्सी के मोहताज नहीं होते। ‘ऐसे मूल्यों को अपने आचरण से जीवंत कर रहे हैंश्री कैलाश मकवाना जी