हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं
डरता सा, सिसकता सा, तड़पता सा, अपने असंख्य घावों से रिसते बर्बादियों के निशानों के साथ घिसटने को मजबूर, मेरे विकास को नोच कर मुझसे दूर करती कुछ चांडाल चौकड़ी की मनमर्जी, मेरा इलाज नही बल्कि मेरा बलात्कार करता निगम का राजनीतिक तंत्र, क्या कभी इसमें सुधार आएगा, क्या कभी में कह सकूंगा सहारनपुर स्वस्थ है?, आखिर कब तक
बेबस, लाचार, दुःखी, पीड़ा का दंश झेलता में सहारनपुर सिसकने को मजबूर, पहले स्मार्ट सिटी ने तड़पाया, फिर निगम के जालिम ठेकेदारों ने शहर की आत्मा को झिंझोड़ा, कुछ समय मिला तो निगम की राजनीति ने भी समस्याओ का दामन नही छोड़ा? समय बीता, उम्मीदे परवान चढ़ी, कार्य प्रगति पर है इस जुमले ने मानो मेरे भीतर कोई बड़ा घाव कर दिया, अब कुछ सकून मिलने की उम्मीद जगी थी, कमबख्त निगम और संगठन की लड़ाई ने जैसे सहारनपुर का सीना ही छलनी कर दिया, कोई नही जो सत्य बताये, कोई है जो मेरे अंतर्मन में झांके? अब लगता है कि खामोश सी जिंदगी उमड़ते घुमड़ते सपने ओर सपनो के मध्य कुछ अपनो की शिकायते, कुछ अपनो की दखलंदाजी, कुछ अपरिपक्व निर्णयों की कालिख से रंगे समाज के वह अनसुलझे कारण जिन्होंने शहर का हाल बेहाल करने में कोई कसर नही छोड़ी, कभी संगठन ने भगाया, कभी निगम की ताबेदारी की, कभी अपनो से नाराजगी मोल ली, *कभी समाज के बेनूर होते चेहरों की दरकती सलवटे, कभी घाबो के बीच मे लोगो के सुनते ताने, कभी समाज के वह बेसुरे गाने आखिर मेरा दोष क्या है? कोई बताएगा, प्यार की दहलीज पर मेरा सिर रखकर दबाएगा, मेरे घाबो की चिंता करेगा या यूं ही बस मेरा दोहन हर साल होगा, बार बार होगा, या यूं कहें तो बलात्कार होगा? क्या इसके लिए निगम जिम्मेदार होगा या फिर समाज का वो आम इंसान जो रोजमर्रा की घुटी घुटी सी जिंदगी जीने के लिए सिसक रहा है। या फिर वह कर्णधार जो आपस मे लड़कर बस मेरा दामन फाड़ते है? मेरा ही लहू पीते है, ना जाने कैसे जीते है? लज्जा को जैसे बेचकर खा गए, जनता को भी बस रुला रहे, मैं खामोश हूं क्योंकि मेरा बस नही चलता? रोने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नही? अधखुली आंखों से देखकर महसूस करता हूं, बस अब तो इतना सा ख्वाब है कोई सहारनपुर के घावो पर मरहम लपेट दे, चिथड़े चिथड़े हो चले दामन में थोड़ा सा पैबंद ही लगा दे, कही किसी गली मोहल्ले में मेरा भी बुत बना दे क्योकि अब तो जगह जगह लगे बोर्डो पर भी आई लव सहारनपुर की बत्तियां बुझ चुकी है, चौराहे पर बड़े बड़े शेरो की प्रतिमाओं के नीचे लगे पत्थर तक हट चुके है, अब लोगो के ताने सुन कर मैं बेहाल हूं, वक्त का मारा न जाने क्यों में इतना लाचार हूं?, क्या सहारनपुर का कोई सरपरस्त है या फिर सब नोच कर खाने वाले है, सहारनपुर के दामन में जो थोड़े बहुत दाने है लगता है वह भी इस समाज के ठेकेदारों ने खाने है, फिर कहां से लाएंगे नया समाज, कहा से लाएंगे नया सहारनपुर, कहा से लाएंगे वह हसरते जो न जाने हमे कहा ले जाने के लिऐ बेताब है। अब कौन है मेरा वली वारिस? क्या सहारनपुर का का सीना यू ही छलनी होता रहेगा?या कोई मेरा क्लॉज कराएगा? या फिर में यू ही सिसक सिसक कर एक दिन दम तोड़ दूंगा? बस यही मेरा दर्द है, जो शायद आम आदमी समझता है लेकिन संवेदन हीन तंत्र और राजनीति समझने को तैयार नही? लगता है अब होगी भी नही? लगता है मेरे दामन से लोग करोड़पति तो निकले लेकिन सेवक नही निकलेअब देखते है क्या होगा? कितने दिन ओर बचे है मेरे या फिर यू ही मेरी बर्बादियों का सिलसिला चलता रहेगा। …….
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं।
आलोक अग्रवाल
एक लेख सहारनपुर की व्यथा उसी की जुबानी
रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़