किशोर कुमार दुर्ग छत्तीसगढ़ ब्यूरो चीफ इंडियन टीवी न्यूज नेशनल
भारतीय संविधान के तहत प्रेस की स्वतंत्रता (Freedom of Press) और आम नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) को अलग-अलग अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। वास्तव में दोनों को अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत शामिल किया गया है, जिसमें कहा गया है कि –
“सभी नागरिकों को वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा।”
1. संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का विशेष प्रावधान क्यों नहीं?
भारत के संविधान निर्माताओं ने प्रेस के लिए कोई अलग अनुच्छेद नहीं बनाया। इसका कारण यह था कि प्रेस को कोई अतिरिक्त विशेषाधिकार देना उचित नहीं माना गया। प्रेस भी अंततः नागरिकों से ही बना है और उसकी स्वतंत्रता, नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ही उत्पन्न होती है।
2. समानता का सिद्धांत
एक नागरिक अपने विचार बोलकर, लिखकर, चित्रों या किसी अन्य माध्यम से प्रकट कर सकता है।
प्रेस (अख़बार, पत्रिकाएँ, मीडिया संस्थान) भी वही काम करता है – विचारों और सूचनाओं को अभिव्यक्त करना और जनता तक पहुँचाना।
इसलिए प्रेस की स्वतंत्रता अलग अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक की स्वतंत्रता का ही सामूहिक या संगठित रूप है।
3. यथोचित प्रतिबंध (Reasonable Restrictions)
अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत चाहे प्रेस हो या आम नागरिक – सभी पर समान प्रतिबंध लागू होते हैं।
ये प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं:
राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए
राज्य की सुरक्षा के लिए
विदेशी राज्यों के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों के लिए
सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के लिए
मानहानि, न्यायालय की अवमानना या अपराध हेतु उकसाने से रोकने के लिए
4. न्यायालय की व्याख्याएँ
Romesh Thapar बनाम State of Madras (1950): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रेस की स्वतंत्रता सीधे अनुच्छेद 19(1)(a) से निकलती है।
Brij Bhushan बनाम State of Delhi (1950): प्रेस पर सेंसरशिप लगाने के आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना गया।
5. निष्कर्ष
भारतीय संविधान में प्रेस और आम नागरिक दोनों के लिए स्वतंत्रता का आधार समान है – अनुच्छेद 19(1)(a)।
प्रेस की स्वतंत्रता, नागरिकों की स्वतंत्रता से अलग नहीं है बल्कि उसी का विस्तार है। इस प्रकार, प्रेस और आम नागरिक दोनों ही एक ही संवैधानिक छतरी के नीचे समान अधिकार और समान प्रतिबंध साझा करते हैं।