वार्ड नंबर 5 में मुकाबले का केंद्र बने पत्रकार व भाकियू नेता रामोद कुमार
सबका काम, सबका विकास – वार्ड नंबर 5 में सबसे मज़बूत दावेदार रामोद कुमार
बिजनौर।नजीबाबाद क्षेत्र पंचायत सदस्य वार्ड नंबर 5 का चुनाव नज़दीक आते ही गांव-गांव में चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। तमाम दावेदार मैदान में हैं, लेकिन सबसे मज़बूत नाम पत्रकार व भाकियू नेता रामोद कुमार का सामने आ रहा है। ग्रामीणों से लेकर किसान यूनियन कार्यकर्ताओं तक हर जगह उनका नाम जोश और उम्मीद के साथ लिया जा रहा है।
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पत्रकारिता से संघर्ष और फिर समाजसेवा का सफर
रामोद कुमार ने वर्षों तक पत्रकारिता के माध्यम से जनता की आवाज़ उठाई। चाहे टूटी सड़क हो, किसानों की फसल का दाम हो, या युवाओं की बेरोज़गारी – उन्होंने हर मुद्दे को निडरता से सामने रखा।
भाकियू नेता होने के नाते उन्होंने किसानों की समस्याओं के लिए धरना, प्रदर्शन और आंदोलन तक किए। इसी वजह से उनकी पहचान “संघर्षशील और ईमानदार नेता” के रूप में बनी।
ग्रामीण और भाकियू कार्यकर्ताओं का कहना है कि रामोद कुमार ने बिना पद पर रहते हुए भी कई ऐसे कार्य किए जिनसे जनता को सीधा लाभ मिला। गरीब मजदूरों के साथ खड़े रहना, किसान आंदोलनों में अहम भूमिका निभाना और आम लोगों के हक़ के लिए संघर्ष करना उनकी पहचान है।
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युवाओं, महिलाओं और किसान मजदूरों की पहली पसंद
युवाओं का कहना है कि रामोद कुमार जैसा नेतृत्व उन्हें रोजगार और खेलकूद के नए अवसर देगा।
महिलाओं का कहना है कि वे उनकी समस्याओं को सुनते भी हैं और हल भी कराते हैं।
“रामोद कुमार किसान हितैषी नेता हैं, जिन्होंने हमारी हर लड़ाई में साथ दिया। अगर वो चुनाव जीतते हैं तो किसानों की आवाज़ सीधे पंचायत तक पहुंचेगी।”
स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस बार मुकाबले में कई दावेदार मैदान में हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश का ज़मीनी जुड़ाव कमज़ोर है। कुछ नेता केवल चुनावी समय पर जनता के बीच नज़र आते हैं, जबकि रामोद कुमार वर्षों से लगातार जनता के बीच मौजूद रहे हैं।
युवाओं और किसान संगठनों का खुला समर्थन मिलने की वजह से उन्हें बढ़त मिलती दिख रही है। ग्रामीणों का कहना है कि “बाकी दावेदार केवल वादे कर रहे हैं, जबकि रामोद कुमार ने बिना पद पर रहते हुए भी विकास और संघर्ष की राह दिखाई है।”
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चुनावी समीकरण और बढ़त
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वार्ड नंबर 5 का चुनाव जातीय संतुलन, संगठनात्मक समर्थन और स्थानीय पकड़ पर निर्भर करता है।
जातीय संतुलन: इस वार्ड में किसान व मजदूर वर्ग की संख्या अधिक है, और यही वर्ग रामोद कुमार का परंपरागत समर्थन माना जा रहा है।
संगठन का साथ: भाकियू नेताओं और कार्यकर्ताओं का साफ झुकाव उनके पक्ष में है। किसान आंदोलन में उनकी सक्रियता ने उन्हें संगठन से गहरा जुड़ाव दिलाया है।
स्थानीय पकड़: पत्रकारिता और समाजसेवा से जुड़ाव के चलते वे हर गांव, हर तबके से सीधे संपर्क में रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।विशेषज्ञों का मानना है कि इन समीकरणों को देखते हुए रामोद कुमार का पलड़ा अन्य दावेदारों की तुलना में भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।
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भविष्य का संकल्प
रामोद कुमार ने कहा है –
“मेरा लक्ष्य क्षेत्र का हर गांव विकास की दौड़ में आगे लाना है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और रोजगार – यही मेरी प्राथमिकताएँ रहेंगी। किसान, नौजवान और महिला – यही मेरी ताकत हैं।”
स्थानीय राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पत्रकारिता, भाकियू से जुड़ा अनुभव और समाजसेवा – इन तीनों का मिश्रण रामोद कुमार को अन्य दावेदारों से अलग पहचान दिलाता है।
क्षेत्र के किसान-मज़दूरों का कहना है कि –
“अगर इस बार रामोद कुमार वार्ड नंबर 5 से सदस्य बने तो क्षेत्र की तस्वीर और तक़दीर दोनों बदल देंगे। सबका काम, सबका विकास और किसान-मज़दूर का साथ ही उनका असली नारा है।”