रिपोर्टर: जाकिर झंकार आहवा
कभी “अंधारिया खंड” के नाम से पहचाना जाने वाला डांग जिला प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर क्षेत्र है। सतपुड़ा–सह्याद्री पर्वतमाला के घने जंगलों, पहाड़ियों और नदियों से घिरा यह इलाका भिल जनजाति के राजाओं और नायकों के शासन में था। वे अपनी भूमि और जंगलों से अत्यंत प्रेम करते थे और बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करते थे।
1818 के बाद अंग्रेजों ने डांग पर अधिकार करने का प्रयास किया। संघर्ष हुए और कई नायकों को फांसी दी गई। अंततः 1841 में समझौता हुआ और 1842 से आहवा में “डांग दरबार” आयोजित कर राजाओं को जंगल लीज के बदले वार्षिक धनराशि दी जाने लगी।
स्वतंत्रता के बाद 1947 में डांग को जिला बनाया गया। 1 मई 1960 को गुजरात राज्य के गठन के समय इसे गुजरात में शामिल किया गया। उस समय के मुख्यमंत्री डॉ. जीवराज मेहता ने डांग के नेताओं की मांगें स्वीकार करते हुए सरकारी कर्ज माफ किया और विकास हेतु डांग रिजर्व फंड की स्थापना की।
आज डांग जिला विकास की ओर अग्रसर है। यहां के राजाओं का पारंपरिक सफेद वस्त्र, पगड़ी और स्वर्ण-रजत आभूषण उनकी शान, सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक थे। डांग का इतिहास साहस और सांस्कृतिक विरासत का अनमोल अध्याय है।