रिपोर्ट अजय सिंह तोमर
पोरसा
क्षत्रिय धर्मशाला से निकली शोभायात्रा ने शहर के प्रमुख मार्गों का किया भ्रमण, वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के साहस, त्याग और स्वाभिमान पर डाला प्रकाश
पोरसा|शहर में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती बड़े ही हर्षोल्लास, उत्साह और गौरव के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की शुरुआत क्षत्रिय धर्मशाला से भव्य शोभायात्रा के साथ हुई। शोभायात्रा में महाराणा प्रताप की आकर्षक झांकी, घोड़े, भगवा ध्वज, ढोल-नगाड़े एवं बैंड-बाजों के साथ बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए। युवाओं द्वारा “महाराणा प्रताप अमर रहें”, “जय राजपूताना”, “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के जयकारों से पूरा शहर गुंजायमान हो उठा।
शोभायात्रा क्षत्रिय धर्मशाला से प्रारंभ होकर जोटई रोड, पुरानी बस्ती, नागाजी मंदिर, सदर बाजार, सब्जी मंडी रोड, अटेर रोड होते हुए साधू सिंह के तिराहे पर पहुंची। इसके बाद मुख्य मार्ग एवं बरगद चौराहे से होते हुए पुनः क्षत्रिय धर्मशाला पर समापन हुआ। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर समाजसेवियों, व्यापारियों एवं नागरिकों द्वारा पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का स्वागत किया गया। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं के लिए शीतल पेय एवं जलपान की व्यवस्था भी की गई थी।
शोभायात्रा के दौरान युवाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। कई युवा पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में नजर आए तथा हाथों में भगवा ध्वज लेकर महाराणा प्रताप के जयकारे लगाते हुए चल रहे थे। महिलाओं एवं बच्चों ने भी कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर सहभागिता की। शहर के प्रमुख मार्गों पर लोगों ने घरों और दुकानों के बाहर खड़े होकर शोभायात्रा का स्वागत किया।
इस अवसर पर आयोजित सभा में क्षत्रिय समाज के वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के जीवन, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि महाराणा प्रताप केवल मेवाड़ के शासक नहीं थे, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, स्वतंत्रता और अदम्य साहस के प्रतीक थे। उनका जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदय सिंह एवं माता जयवंता बाई के घर हुआ था। बचपन से ही प्रताप में वीरता, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना दिखाई देती थी।
वक्ताओं ने बताया कि महाराणा प्रताप का बचपन भीलों के बीच बीता, जो उन्हें प्यार से “कीका” कहकर पुकारते थे। उन्होंने सदैव समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का कार्य किया। कठिन परिस्थितियों में भी भील समाज और आम जनता महाराणा प्रताप के साथ मजबूती से खड़ी रही। यही उनकी जनप्रियता और नेतृत्व क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण था।
सभा में हल्दीघाटी युद्ध का विशेष उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने कहा कि 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप ने अपनी छोटी सेना के साथ मुगल बादशाह अकबर की विशाल सेना का सामना किया। यह युद्ध केवल राज्य का नहीं, बल्कि स्वाभिमान, स्वतंत्रता और मातृभूमि की रक्षा का युद्ध था। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद महाराणा प्रताप ने कभी हार नहीं मानी तथा अंतिम सांस तक मेवाड़ की आन-बान-शान के लिए संघर्ष करते रहे।
वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक की वीरता और स्वामीभक्ति का भी भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद चेतक ने अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। चेतक की निष्ठा और बलिदान आज भी इतिहास में अमर है तथा वह स्वामीभक्ति का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।
सभा में कहा गया कि मुगल सम्राट अकबर ने महाराणा प्रताप को अधीन करने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन मेवाड़ का यह शेर कभी मुगलों के सामने नहीं झुका। उन्होंने जंगलों और पहाड़ों में रहकर कठिन जीवन व्यतीत किया, लेकिन अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया। वक्ताओं ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, व्यक्ति को सत्य, स्वाभिमान और राष्ट्रहित के लिए संघर्ष करते रहना चाहिए।
वक्ताओं ने भामाशाह के योगदान को भी याद किया। उन्होंने बताया कि संघर्ष के कठिन समय में भामाशाह ने अपनी पूरी संपत्ति महाराणा प्रताप को समर्पित कर दी थी, जिससे महाराणा ने पुनः अपनी सेना तैयार की और मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। यह त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
सभा में वक्ताओं ने युवाओं से महाराणा प्रताप के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को इतिहास से प्रेरणा लेकर राष्ट्रभक्ति, साहस, स्वाभिमान और सामाजिक एकता को मजबूत करना चाहिए। समाज में बढ़ती नशाखोरी, सामाजिक बुराइयों और संस्कारहीनता को रोकने के लिए युवाओं को अपने महापुरुषों के आदर्शों पर चलना होगा।
वक्ताओं ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका प्रसिद्ध कथन — “भेड़ की तरह सौ साल जीने से बेहतर है कि शेर की तरह एक दिन जिया जाए” — आज भी युवाओं में साहस, आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति की भावना जगाता है।
कार्यक्रम के अंत में महाराणा प्रताप के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। आयोजन में क्षत्रिय समाज के वरिष्ठजन, युवा, महिलाएं एवं बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे। पूरे आयोजन के दौरान राष्ट्रभक्ति, शौर्य और स्वाभिमान का अद्भुत वातावरण देखने को मिला।