अजय कुमार श्रीवास्तव अज्जू
पत्रकारिता छोड़ने के बाद सबसे पहले जो चीज़ जन्म लेती है, वह है “महान यादें”। ऐसी यादें जिनमें हर छोटा पत्रकार खुद को लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी और हर प्रेस कॉन्फ्रेंस को कुरुक्षेत्र का युद्ध समझने लगता है।
जो कभी नगर निगम की टूटी नाली पर खबर लिखता था, वह भी दस साल बाद ऐसे किस्से सुनाता है मानो उसने नगर निगम के कई बड़े घोटाले का राज फाश कर के नगर आयुक्त और मेयर को जेल भिजवा दिया हो।
जो पत्रकार अपने समय में संपादक के एक फोन से कांप जाता था, वही रिटायरमेंट के बाद चाय की दुकान पर बैठकर कहता है “हमारे समय में सत्ता हमसे डरती थी…” सत्ता बेचारे उस समय भी नहीं डरती थी, बस पहचानती तक नहीं थी।
पत्रकारिता की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह आदमी को खबर से ज्यादा अपनी कहानी का लेखक बना देती है। धीरे-धीरे वह अपनी स्मृतियों को पॉलिश करता है, संघर्षों पर इत्र छिड़कता है और असफलताओं को “सिस्टम से लड़ाई” घोषित कर देता है।
पुरानी डायरी के पीले पन्ने अचानक क्रांति के दस्तावेज़ बन जाते हैं। कभी प्रेस क्लब में उधारी की चाय पीने वाला आदमी आज बताता है कि “पत्रकारिता एक मिशन थी…”
मिशन इतनी बड़ी चीज़ थी कि महीने के आखिर में किराया देने के लिए वही मिशन स्कूटर बेचने पर मजबूर कर देता था।
सच तो यह है कि पत्रकारिता की दुनिया उतनी रोमांटिक कभी थी ही नहीं, जितनी बाद में याद की जाती है।
वहां भी राजनीति थी, चमचागिरी थी, गुटबाज़ी थी, विज्ञापन के सामने झुकते संपादक थे और खबरों के पीछे भागते थके हुए लोग थे। लेकिन इंसान जब उस दुनिया से बाहर निकलता है, तो उसे अपनी जवानी का हर संघर्ष कविता लगने लगता है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे बूढ़ा आदमी अपने गांव की गरीबी को “सादगी” और बेरोज़गारी को “संस्कार” कहने लगता है।
पत्रकारिता में भी बहुत लोग इसलिए महान दिखते हैं क्योंकि समय उनकी गलतियों के ऊपर धूल जमा देता है।
कई लोग जो अपने दौर में मामूली थे, बाद में “वरिष्ठ पत्रकार” कहलाने लगते हैं। भारत में “वरिष्ठ” शब्द अक्सर अनुभव से ज्यादा उम्र और बेरोज़गारी देखकर दिया जाता है।
फिर शुरू होती है समर्पण की कथा। हर दूसरा आदमी कहता है “मैंने पत्रकारिता को अपना जीवन दे दिया…” पत्रकारिता भी अंदर ही अंदर सोचती होगी “भाई, मैंने मांगा कब था?”
समर्पण बड़ा भारी शब्द है। यह शब्द वही लोग सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं जिन्हें समय पर वेतन नहीं मिला, प्रमोशन नहीं मिला या जिन्हें सत्ता ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। फिर वे अपनी उपेक्षा को आदर्शवाद का नाम दे देते हैं।
लेकिन कुछ लोग सचमुच अलग भी होते हैं। वे पत्रकारिता को नौकरी नहीं, समाज की चेतना मानते हैं। उनकी लड़ाई खबर छापने से ज्यादा सच बचाने की होती है। ऐसे लोग कम होते हैं, क्योंकि सच के साथ जीना आसान नहीं होता।
पत्रकारिता प्रेम केवल प्रेस कार्ड से पैदा नहीं होता।
उसके लिए भीतर बेचैनी चाहिए, पढ़ने की भूख चाहिए, समाज को समझने की क्षमता चाहिए। औसत सोच वाला आदमी सिर्फ माइक्रोफोन पकड़ सकता है, पत्रकार नहीं बन सकता।
आजकल तो हाल यह है कि कई लोग कैमरे के सामने खड़े होकर खुद को पत्रकार मान लेते हैं। उनकी पूरी पत्रकारिता “भाई नमस्कार…” से शुरू होकर “चैनल को सब्सक्राइब करें…” पर खत्म हो जाती है।
ना अध्ययन, ना संवेदना, ना वैचारिक गहराई।
बस गले में आईडी कार्ड और जेब में मोबाइल
ऐसे समय में अगर कोई पत्रकारिता छोड़ता है, तो वह हमेशा हार नहीं होती। कई बार वह अपने भ्रम से बाहर निकलने की शुरुआत होती है। हर आदमी खबरों के शोर में जीने के लिए नहीं बना होता।
कुछ लोग देर से समझते हैं कि वे सच में पत्रकार नहीं, सिर्फ भीड़ का हिस्सा थे। और यह समझ लेना भी कम साहस की बात नहीं।
पत्रकारिता छोड़ना दुखद तब होता है जब आदमी सच से हारकर भागे। लेकिन अगर वह खुद को ईमानदारी से पहचान ले, तो वही विदाई मुक्ति बन जाती है।
क्योंकि अंत में पत्रकारिता किसी प्रेस कार्ड का नाम नहीं है। यह भीतर की आग है। अगर वह बची हुई है, तो आदमी अखबार छोड़े या चैनल पत्रकार बना रहता है। और अगर वह आग बुझ गई, तो फिर लाख “वरिष्ठ पत्रकार” लिखवा लो, शब्दों में सिर्फ धुआँ बचता है।