संतन दास मानिकपुरी ब्यूरो चीफ महासमुदं छतीसगढ
छ्तीसगढ़ में बाद में आने वाले सभी वर्गों , जातियों समाजों ने आदिवासियों की ही संस्कृति को ही आगे बढ़ाया , आदिवासियों की देवी-देवताओं को माना , उनकी भाषाओं को अपनाया , उनके तीज-त्यौहारों को स्वीकारा । आदिवासियों की संस्कृति में पूरी तरह से ढल गए और इसी संस्कृति और भाषा को लेकर छ्तीस अलग-अलग किलों के आधार पर इस अंचल का नाम छ्तीसगढ़ बहुत पहले ही रख दिया गया था और 1नवम्बर सन 2000 को एक पृथक राज्य का दर्जा मिला ।
गुंडाधुर , गेंदसिंह और वीर नारायण सिंह ने जिस संस्कृति को जिया था उसी संस्कृति को पंडित वल्लभाचार्य , सुन्दरलाल शर्मा , रविशंकर शुक्ल , चन्दुलाल चन्द्राकर , रामदयाल तिवारी , छोटेलाल श्रीवास्तव , पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी , पं.लोचन प्रसाद पांडे, डॉ.ई.राघवेन्द्र राव , मुकुटधर पांडे , बंशीधर पाण्डेय , झाडूराम देवांगन , ताराचंद साहू , विनय पाठक और भी ऐसे कई शख्सियत हैं , जिन्होने छ्तीसगढ़ी को मातृभाषा स्वीकार कर छ्तीसगढ़ी संस्कृति को अपनाया ।
यहाँ रहने वाले विभिन्न जाति-समाज जैसे – तेली , कुर्मी , कोष्टा , कलार , केंवटा , बनिया , अघरिया , नऊ, धोबिया , रउत , बावहन , बावा , भोलिया , पइनका , चन्द्रनाहू , माली, छिपिया, सतनामी, कुम्हार , लुहार, मंझिया ऐसी कुछ और जातियाँ है जो छ्तीसगढ़ी संस्कृति को आज भी आदिवासियों के साथ मिलकर आगे बढ़ा रहीं हैं । इन्ही सब लोगों को समेकित रूप से छ्तीसगढ़िया कहा जाता है ।
इन छ्तीसगढ़ियों की केवल एक ही पहचान है , इनके पूर्वजों का कोई अवशेष आपको अन्य किसी राज्यों में नहीं मिलेंगे ।
परन्तु हाल के कुछ 50-70 सालों में छ्तीसगढ़ में बाहर से आकर रहने वाले लोग जिनमें उपरोक्त जातियों में से कुछ जातियों के लोग भी हो सकते हैं , ऐसे लोगो ने न तो यहाँ की भाषा स्वीकार की और न ही यहाँ की संस्कृति को माना , उन्होनें छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढियों को सिवाय लूटने के और कोई काम नहीं किया , ये ऐसे लोग हैं जो खाते हैं छत्तीसगढ़ का और गाते अपने प्रदेश का । । ऐसे ही लोगों को परदेसिया कहा जाता है ।
दक्षिण कोसल और महाकांतार की आदिवासी संस्कृति को मानने वाले ही असली छत्तीसगढ़िया माने जाते हैं , मारवाड , सिंध ,पंजाब , यूपी,बिहार , हरियाणा , राजस्थान , गुजरात , मद्रास , बंगाल आदि अन्य राज्यों की संस्कृति को मानने वाले नहीं ।