अभी कुछ ही दिनों पहले गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने राज्य में अपराध और अवैध गतिविधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति लागू करने के बड़े-बड़े दावे किए थे लेकिन इन दावों के चंद दिनों बाद ही सूरत के लसकाना इलाके में एक ऑटो रिक्शा से अवैध विदेशी शराब की बड़ी खेप पकड़े जाने के बाद सरकार और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं लसकाना पुलिस की कार्रवाई और जब्त माललसकाना पुलिस स्टेशन की टीम को मिली सटीक मुखबिरी के आधार पर खड़सद गांव से वाई जंक्शन गढ़पुर जाने वाले मार्ग पर नाकाबंदी की गई थी। इस दौरान पुलिस ने एक ऑटो रिक्शा को रोककर तलाशी ली, जिसमें से अवैध रूप से विदेशी शराब की तस्करी कर रहे चार आरोपियों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया गिरफ्तार आरोपियों में तीन महिलाएं भी शामिल हैं मोहम्मद सलमान सब्बीर मंसूरीआरतीबेन रमेशभाई सिंहकाजलबेन रमेशभाई सिंहभाग्यश्री धनराज शिरोडकरपुलिस ने इस कार्रवाई के दौरान इंग्लिश शराब की 446 छोटी बोतलें कीमत ₹67,878 और ₹60,000 की कीमत का ऑटो रिक्शा मिलाकर कुल ₹1,27,878 का माल जब्त किया है, हालांकि, इस शानदार कामयाबी के लिए पुलिस इंस्पेक्टर एम.बी. झाला, पीएसआई एन.आर. पटेल और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है, लेकिन इस घटना के पीछे छुपा बड़ा सच सीधे तौर पर सरकार की नाकामियों की तरफ इशारा करता है जीरो टॉलरेंस की हवा निकली ? सरकार से तीखे सवालगृह मंत्री हर्ष संघवी के गृह नगर सूरत में ही अगर इस तरह खुलेआम ऑटो रिक्शा में शराब घूम रही है, तो राज्य के बाकी हिस्सों का क्या हाल होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। इस मामले के सामने आने के बाद जनता के मन में सरकार की मंशा पर कई तीखे सवाल उठ रहे हैं आखिर गुजरात में शराब आ कहां से रही है? सरकार हमेशा दावा करती है कि गुजरात की सीमाओं पर कड़ी चौकसी और पुलिस का कड़ा पहरा है। अगर सीमाएं इतनी ही सुरक्षित हैं, तो पड़ोसी राज्यों से शराब का इतना बड़ा जत्था गुजरात के शहरों और गलियों तक कैसे पहुंच जाता है? बूटलेगरों में कानून का डर क्यों नहीं?सरकार चाहे कितनी भी कड़क कार्रवाई की बातें क्यों न करे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बूटलेगर अब महिलाओं को आगे करके बेखौफ होकर रिक्शा में शराब की सप्लाई कर रहे हैं,कानून का यह खत्म होता खौफ सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति को दर्शाता है।शराब माफियाओं और बड़े चेहरों पर कार्रवाई कब होगी? पुलिस अक्सर रिक्शा चालकों, डिलीवरी बॉय या छोटे-मोटे पैडलर्स को पकड़कर अपनी पीठ थपथपा लेती है। लेकिन इस पूरे सिंडिकेट के पीछे बैठे असली आकाओं और बड़े माफियाओं तक पुलिस के हाथ क्यों नहीं पहुंचते? खोखले नारे और इच्छाशक्ति का अभावगुजरात में शराबबंदी कानून को पूरी तरह से लागू करने में सरकार विफल साबित हो रही है। एक तरफ राज्य में विकास और रोजगार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ युवाओं को खोखला करने वाला नशा हर गली-मोहल्ले में आसानी से उपलब्ध है, गृह मंत्री का ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा सिर्फ सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने और वाहवाही लूटने तक ही सीमित दिखाई दे रहा है।अगर सरकार वाकई गुजरात को नशामुक्त और सुरक्षित बनाना चाहती है, तो उसे छोटे-मोटे मामलों पर संतोष करने के बजाय शराब की तस्करी के इस पूरे नेटवर्क को जड़ से उखाड़ना होगा, जब तक इस अवैध धंधे को संरक्षण देने वाले बड़े चेहरों पर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक जनता यही मानेगी कि ‘जीरो टॉलरेंस’ महज एक खोखला चुनावी और राजनीतिक नारा है।
संवाददाता : सुमित शुक्ला