बिहार मोतीहारी से अमरजीत सिंह
13 सितंबर 2026 को विश्वविद्यालय से संबंधित तथाकथित कैग (CAG) रिपोर्ट जो कि वस्तुतः (ऑडिट का प्रारंभिक ऑब्जर्वेशन है) के आधार पर प्रकाशित समाचार के संबंध में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की आधिकारिक प्रतिक्रिया महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (“विश्वविद्यालय”) यह स्पष्ट करना आवश्यक समझता है कि 13 सितंबर 2026 को प्रकाशित समाचार रिपोर्ट में उल्लिखित टिप्पणियां भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की प्रारंभिक लेखापरीक्षा प्रेक्षण (ऑडिट ऑब्ज़र्वेशन) हैं, न कि अंतिम निष्कर्ष । इन्हें अंतिम निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाना भ्रामक है तथा इससे विश्वविद्यालय की छवि को अनावश्यक रूप से क्षति पहुंचती है, जिसका विश्वविद्यालय खंडन करता है। विश्वविद्यालय में समस्त कार्य नियमानुसार ही संपादित किए गए हैं। विश्वविद्यालय ने अप्रैल 2026 में ही संबंधित अभिलेखों, दस्तावेजी साक्ष्यों तथा अनुबंधों सहित 256 पृष्ठों का विस्तृत, बिंदुवार प्रत्युत्तर लेखापरीक्षा प्राधिकारियों को प्रस्तुत कर दिया था। अब तक कैग कार्यालय द्वारा इस संबंध में कोई अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है।
1. परिसर की लागत एवं विलंब से संबंधित स्पष्टीकरण ₹850 करोड़ की राशि परियोजना की कभी भी अंतिम स्वीकृत डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) लागत नहीं रही। ₹1,338.83 करोड़ का प्राक्कलन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) द्वारा विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों तथा विद्यार्थियों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के उपरांत तैयार किया गया था, जिसे संबंधित सांविधिक निकायों से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त होने के बाद अंतिम स्वीकृति हेतु शिक्षा मंत्रालय को प्रस्तुत किया गया। इस प्राक्कलन में विश्वविद्यालय के सुचारु संचालन हेतु आवश्यक समस्त बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) सम्मिलित है।
वर्ष 2009 में स्थापित अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की लागत से इसकी तुलना करना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक विश्वविद्यालय की आवश्यकताएं, परिस्थितियां तथा प्राथमिकताएं भिन्न-भिन्न होती हैं। प्रस्तावित प्राक्कलन वर्तमान में सक्षम प्राधिकार से अनुमोदन की प्रक्रिया में है, और इस संबंध में शिक्षा मंत्रालय की ओर से किसी न्यूनतम अथवा अधिकतम राशि निर्धारित करने संबंधी कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय की डिज़ाइन एवं बुनियादी ढांचा संबंधी योजना अपनी आवश्यकताओं तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के लागू मानकों के अनुरूप तैयार की गई है।
2. कार्यों के विभाजन संबंधी स्पष्टीकरण किसी भी कार्य को खरीद प्रक्रिया से बचने के उद्देश्य से जानबूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित नहीं किया गया। विभिन्न परिसरों में संबंधित आवश्यकताएं अलग-अलग समय पर, वास्तविक आवश्यकता तथा तात्कालिकता के आधार पर स्वतंत्र रूप से उत्पन्न हुई थीं।
3. कथित अतिरिक्त भुगतान संबंधी स्पष्टीकरण ₹3.31 लाख का कथित अतिरिक्त भुगतान एक लिपिकीय (क्लेरिकल) त्रुटि के कारण हुआ, जिसमें “4000”
इकाइयों के स्थान पर भूलवश “400” अंकित कर दिया गया था। इस त्रुटि की पहचान कर इसे यथाशीघ्र सुधार दिया गया। स्पष्ट किया जाता है कि इस त्रुटि के कारण न तो कोई अतिरिक्त भुगतान हुआ और न ही सरकारी कोष को कोई हानि पहुंची।
4. अभिलेखों की अनुपलब्धता संबंधी स्पष्टीकरण
संबंधित कायदिश (वर्क ऑर्डर) तथा कार्य-समापन प्रमाण-पत्र (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) उपलब्ध थे और भुगतान वाउचरों के साथ संलग्न किए गए थे। यह मामला केवल फाइलिंग तथा अनुक्रमण (इंडेक्सिंग) संबंधी था, न कि अभिलेखों के अस्तित्व में न होने से जुड़ा था। यह त्रुटि अब सुधार दी गई है।
5. संगोष्ठी एवं जलपान व्यय संबंधी स्पष्टीकरण
संगोष्ठियों (सेमिनार) तथा जलपान (रिफ्रेशमेंट) पर हुआ व्यय प्रारंभिक प्राक्कलनों की तुलना में अधिक वास्तविक शैक्षणिक सहभागिता तथा समयबद्ध शैक्षणिक आवश्यकताओं के कारण हुआ । विश्वविद्यालय ने इस
संबंध में प्राप्त लेखापरीक्षा प्रेक्षणों को रचनात्मक रूप से स्वीकार करते हुए संबंधित अनुपालन तंत्र (कंप्लायंस मैकेनिज्म) को और सुदृढ़ किया है।
महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी पारदर्शिता, जवाबदेही, उचित प्रक्रिया तथा सार्वजनिक धन के जिम्मेदार उपयोग के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है तथा जहां भी आवश्यक हो, सभी उचित सुधारात्मक कार्रवाई हेतु तत्पर है।