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रावण जन्म के साथ शुरू हुआ एक माह का आयोजन, हाथी पर सवार होकर पहुंचे काशी नरेश; 1783 से चली आ रही परंपरा आज भी कायम

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वाराणसी। आधुनिक दौर में जब धार्मिक आयोजनों में मंच, माइक और रोशनी की चकाचौंध आम हो गई है, वहीं रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप ही होती है। यहां न माइक का इस्तेमाल होता है और न ही आधुनिक प्रकाश व्यवस्था का। पेट्रोमेक्स की रोशनी, रामचरितमानस की चौपाइयां और कलाकारों के पारंपरिक संवाद ही इस लीला की पहचान हैं।
शुक्रवार को रावण जन्म के प्रसंग के साथ रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला का शुभारंभ हुआ। पहले ही दिन बारिश और बदले मौसम के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु और रामलीला प्रेमी पहुंचे। लीला के दौरान ‘चुप रहो, सावधान’ की आवाज गूंजते ही हजारों की भीड़ में सन्नाटा छा गया और इसके बाद रामचरितमानस की चौपाइयों के साथ मंचन आगे बढ़ा। पहले दिन रावण जन्म और क्षीर सागर की झांकी का मंचन किया गया।
काशी नरेश के पहुंचने पर शुरू होती है लीला
रामनगर की रामलीला में काशी राज परिवार की परंपरा का विशेष महत्व है। काशी नरेश अनंत नारायण सिंह शुक्रवार को राजसी वेशभूषा में हाथी पर सवार होकर लीला देखने पहुंचे। परंपरा के अनुसार काशी राज परिवार के मुखिया की मौजूदगी के बाद ही रामलीला का शुभारंभ माना जाता है।
करीब एक महीने तक चलने वाली इस लीला में हर दिन अलग-अलग प्रसंगों का मंचन किया जाएगा। इसके साथ रामनगर और आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियों का माहौल भी बना रहेगा।

1783 से कायम है पुराना स्वरूप
रामनगर की रामलीला की शुरुआत 1783 में तत्कालीन काशी नरेश उदित नारायण सिंह के समय हुई थी। दो शताब्दियों से अधिक समय गुजरने के बाद भी इसके पारंपरिक स्वरूप में खास बदलाव नहीं आया है। यही वजह है कि देश-विदेश से लोग इस अनूठी रामलीला को देखने पहुंचते हैं।
इस लीला की खासियत इसका किसी एक मंच तक सीमित न होना भी है। करीब चार से पांच किलोमीटर के दायरे में अलग-अलग स्थानों को प्रसंग के अनुसार लीला स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अयोध्या, जनकपुरी और लंका समेत विभिन्न प्रसंगों के लिए अलग-अलग स्थानों पर मंचन होता है।
पेट्रोमेक्स की रोशनी में संवाद और चौपाइयां
रामनगर की रामलीला में आधुनिक मंचीय तकनीक से दूरी इसकी सबसे अलग पहचान है। माइक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। कलाकार अपने पारंपरिक संवाद ऊंची आवाज में बोलते हैं और रामचरितमानस की चौपाइयों के आधार पर लीला आगे बढ़ती है। प्रकाश व्यवस्था के लिए भी पेट्रोमेक्स का इस्तेमाल किया जाता है।
लीला प्रेमियों के लिए यह केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं बल्कि धार्मिक आस्था से जुड़ा अवसर है। कई श्रद्धालु पूरे महीने अलग-अलग दिनों में होने वाले प्रसंगों को देखने के लिए अपना कामकाज तक छोड़कर रामनगर पहुंचते हैं।
लीला के साथ बदलता रहता है पूरा वातावरण
रामनगर की खासियत यह है कि यहां रामलीला के साथ पूरा क्षेत्र ही प्रसंग के अनुरूप धार्मिक मंच में बदलता नजर आता है। जिस स्थान पर जिस प्रसंग का मंचन होता है, श्रद्धालु उसी वातावरण में उसे देखते और महसूस करते हैं।
पहले दिन से ही रामलीला को लेकर लोगों में उत्साह देखने को मिला। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ेगी, रामनगर के अलग-अलग क्षेत्रों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने की संभावना है। एक माह तक चलने वाला यह आयोजन अपनी पारंपरिक शैली, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक स्वरूप के कारण काशी की विशिष्ट पहचान बना हुआ है।

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