अकोदिया।
आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच हमारी कई पारंपरिक लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। इसी बीच अकोदिया क्षेत्र में संझा माई की परंपरा भी लोक संस्कृति की खूबसूरत झलक प्रस्तुत कर रही है।
संझा पर्व के दौरान बालिकाएं और महिलाएं घरों की दीवारों पर गोबर से संझा माई की आकृतियां बनाकर उन्हें फूलों, रंगों और प्राकृतिक सामग्री से सजाती हैं। शाम के समय समूह में संझा के पारंपरिक गीत गाकर पूजा-अर्चना की जाती है। यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक कला, गीत-संगीत और सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी रही है।
बुजुर्गों का कहना है कि पहले संझा पर्व गांवों और कस्बों में बड़े उत्साह से मनाया जाता था। बालिकाएं कई दिनों तक अलग-अलग आकृतियां बनाकर लोकगीत गाती थीं। बदलते समय के साथ मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव से ऐसी परंपराओं में लोगों की भागीदारी कम होती जा रही है।
संझा माई की परंपरा को जीवित रखने के लिए नई पीढ़ी को इससे जोड़ना जरूरी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत को पहचान और संरक्षित कर सकें।