ब्यूरो चीफ सुंदरलाल जिला सोलन हिमाचल प्रदेश
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने हिमाचल प्रदेश पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा लगाए गए जातिगत उत्पीड़न, संस्थागत भेदभाव और आधिकारिक सत्ता के दुरुपयोग के संवेदनशील मामले में पुलिस विभाग के शीर्ष नेतृत्व के रवैये पर तीखा प्रहार किया है। आयोग ने सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के लगातार अनुपस्थित रहने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे वैधानिक निकाय के प्रति घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना आचरण करार दिया है। यह पूरा मामला शिमला में तैनात पुलिस उप-अधीक्षक विजय कुमार की उस औपचारिक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों पर सोची-समझी रणनीति के तहत जातिगत अपमान, पेशेवर अलगाव, जबरन कठिन कार्य सौंपने और आधिकारिक सुविधाओं से वंचित करने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
डी जी पी की कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाते हुए आयोग ने इस बात पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है कि बार-बार अवसर मिलने के बावजूद हिमाचल प्रदेश के डी जी पी व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। आयोग ने इसे प्रशासनिक अनुशासनहीनता मानते हुए कड़ा संज्ञान लिया है, खासकर तब जब व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए कोई पूर्व या वैध अनुरोध भी प्राप्त नहीं हुआ था। आयोग ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि शीर्ष पुलिस प्राधिकारी द्वारा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की बैठकों से इस तरह लगातार नदारद रहना न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने के समान है। इसके अलावा, आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि डी जी पी कार्यालय यह साबित करने के लिए कोई भी ठोस या लिखित तुलनात्मक साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह विफल रहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई न्यायसंगत और गैर-भेदभावपूर्ण थी, या फिर समान परिस्थितियों में अन्य अधिकारियों के साथ भी ऐसा ही प्रशासनिक बर्ताव किया गया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए NCSC ने राज्य के प्रशासन और पुलिस विभाग को कड़ी हिदायत देते हुए निर्देश दिए हैं कि प्राधिकरण याचिकाकर्ता के स्थानांतरण, कार्यभार ग्रहण करने के आदेश, तैनाती और 05.11.2025 की मूल अधिसूचना से जुड़े सभी दस्तावेज कालक्रम के अनुसार प्रस्तुत करे। आयोग ने कड़े शब्दों में चेताया है कि याचिकाकर्ता को उसकी जातिगत पृष्ठभूमि के कारण या आयोग तक पहुंचने के चलते किसी भी प्रकार के प्रतिशोधात्मक या दंडात्मक कार्रवाई का शिकार न बनाया जाए। साथ ही, आयोग ने दृढ़ता से सिफारिश की है कि याचिकाकर्ता की स्वास्थ्य स्थिति—विशेषकर रीढ़ की चोट और चिकित्सा विश्राम को पूरी प्राथमिकता दी जाए और उसे उसकी पात्रता के अनुसार सभी आधिकारिक सुविधाएं और उपयुक्त कार्य सौंपे जाएं। अंत में, संबंधित प्राधिकारियों को अगली निर्धारित सुनवाई में अनिवार्य रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए है ।
अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य डॉ. पार्थ बिस्वास के समक्ष सुनवाई के दौरान सामने आई है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने हिमाचल प्रदेश पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा लगाए गए जातिगत उत्पीड़न, संस्थागत भेदभाव और आधिकारिक सत्ता के दुरुपयोग के संवेदनशील मामले में पुलिस विभाग के शीर्ष नेतृत्व के रवैये पर तीखा प्रहार किया है। आयोग ने सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के लगातार अनुपस्थित रहने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे वैधानिक निकाय के प्रति घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना आचरण करार दिया है। यह पूरा मामला शिमला में तैनात पुलिस उप-अधीक्षक श्री विजय कुमार की उस औपचारिक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों पर सोची-समझी रणनीति के तहत जातिगत अपमान, पेशेवर अलगाव, जबरन कठिन कार्य सौंपने और आधिकारिक सुविधाओं से वंचित करने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
डी जी पी की कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाते हुए आयोग ने इस बात पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है कि बार-बार अवसर मिलने के बावजूद हिमाचल प्रदेश के DGP व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। आयोग ने इसे प्रशासनिक
अनुशासनहीनता मानते हुए कड़ा संज्ञान लिया है, खासकर तब जब व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए कोई पूर्व या वैध अनुरोध भी प्राप्त नहीं हुआ था। आयोग ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि शीर्ष पुलिस प्राधिकारी द्वारा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की बैठकों से इस तरह लगातार नदारद रहना न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने के समान है। इसके अलावा, आयोग ने यह भी पाया कि पुलिस मुख्यालय यह साबित करने के लिए कोई ठोस या संतोषजनक तुलनात्मक दस्तावेज पेश नहीं कर पाया कि समान परिस्थितियों में अन्य अधिकारियों के साथ भी ऐसा ही प्रशासनिक बर्ताव किया गया था या नहीं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए NCSC ने राज्य के प्रशासन और पुलिस विभाग को कड़ी हिदायत देते हुए निर्देश दिए हैं कि प्राधिकरण याचिकाकर्ता के स्थानांतरण, कार्यभार ग्रहण करने के आदेश, तैनाती और 05.11.2025 की मूल अधिसूचना से जुड़े सभी दस्तावेज कालक्रम के अनुसार प्रस्तुत करे। आयोग ने कड़े शब्दों में चेताया है कि याचिकाकर्ता को उसकी जातिगत पृष्ठभूमि के कारण या आयोग तक पहुंचने के चलते किसी भी प्रकार के प्रतिशोधात्मक या दंडात्मक कार्रवाई का शिकार न बनाया जाए। साथ ही, आयोग ने दृढ़ता से सिफारिश की है कि याचिकाकर्ता की स्वास्थ्य स्थिति—विशेषकर रीढ़ की चोट और चिकित्सा विश्राम को पूरी प्राथमिकता दी जाए और उसे उसकी पात्रता के अनुसार सभी आधिकारिक सुविधाएं और उपयुक्त कार्य सौंपे जाएं।
यहाँ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा दी गई सिफारिशें
आधिकारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करना: आयोग ने सिफारिश की है कि प्राधिकरण याचिकाकर्ता के स्थानांतरण और कार्यभार संभालने से जुड़े प्रासंगिक आधिकारिक रिकॉर्ड, जैसे 05.11.2025 की सरकारी अधिसूचना, बाद के स्थानांतरण आदेश, आवाजाही/कार्यभार संभालने के आदेश और तैनाती आदेश कालानुक्रमिक क्रम में प्रस्तुत करे।
तुलनात्मक विवरण देना: प्राधिकरण को उस अवधि के दौरान स्थानांतरित किए गए समान स्थिति वाले अन्य एचपीपीएस (HPPS) अधिकारियों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करना चाहिए।
वाहन वापसी की स्पष्टता: विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या याचिकाकर्ता के साथ संलग्न वाहन को वापस लेने के संबंध में कोई लिखित आदेश या निर्देश जारी किया गया था, और साथ ही लागू वाहन-आवंटन नीति या आदेश को भी प्रस्तुत करना चाहिए।
कर्तव्यों की प्रकृति का स्पष्टीकरण: चूंकि याचिकाकर्ता को कथित तौर पर सार्थक जिम्मेदारियों से वंचित किया गया था और चुनिंदा रूप से शारीरिक रूप से कठिन व क्षेत्र-आधारित कर्तव्य सौंपे गए थे, इसलिए प्राधिकरण को उस अवधि के दौरान उसे सौंपे गए कर्तव्यों की प्रकृति और सीमा को स्पष्ट करना होगा।
भेदभाव या प्रतिशोध से सुरक्षा: आयोग ने दोहराया है कि याचिकाकर्ता को उसकी जाति की स्थिति के कारण या केवल इसलिए कि उसने अपनी शिकायत के निवारण के लिए आयोग से संपर्क किया है, किसी भी प्रकार के भेदभाव, प्रतिकूल या प्रतिशोधात्मक उपचार का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए।
चिकित्सा स्थिति के अनुसार कार्य: आयोग ने दृढ़ता से सिफारिश की है कि याचिकाकर्ता की चिकित्सा स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसे उपयुक्त कर्तव्य सौंपे जाएं और प्राधिकरण यह सुनिश्चित करे कि उसे किसी भी ऐसी आधिकारिक सुविधा से वंचित न किया जाए जिसका वह हकदार है।
अगली उपस्थिति और कार्रवाई रिपोर्ट: संबंधित प्राधिकारी सुनवाई की अगली तारीख पर उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करें और 15 दिनों के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट (ATR) आयोग को प्रस्तुत करें।