
दशहरे के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और ब्रज क्षेत्र में टेसू-झांझी का पारंपरिक खेल शुरू होता है। इसमें लड़के टेसू और लड़कियां झांझी लेकर घरों में जाती हैं। बच्चे पारंपरिक गीत गाते हैं और लोग उन्हें रुपये या अन्य उपहार देते हैं। यह परंपरा लंबे समय से ग्रामीण क्षेत्रों की लोक संस्कृति का हिस्सा रही है।
मान्यता के अनुसार, टेसू का संबंध महाभारत के वीर बर्बरीक से जोड़ा जाता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर टेसू-झांझी के विवाह की परंपरा भी प्रचलित है। इस आयोजन में बच्चे उत्साह के साथ भाग लेते हैं।
बदलते समय और आधुनिक मनोरंजन के साधनों के बीच यह लोक परंपरा कई जगह कमजोर पड़ रही है। ऐसे में टेसू-झांझी की बिक्री और उनसे जुड़ी गतिविधियां स्थानीय संस्कृति को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सकीट में भी टेसू-झांझी की बिक्री शुरू होने के साथ पारंपरिक त्योहार का माहौल बनने लगा है।
