प्लिंथ प्रमाणपत्र कौन जारी करता है, किस कानूनी अधिकार के तहत और कितनी फीस पर? नए निर्माण, पुराने भवनों तथा पहले पेड़ों और प्राकृतिक वनस्पति से ढके भूखंडों के मामलों में सत्यापन की प्रक्रिया स्पष्ट करने की मांग।
मसूरी। पहाड़ों की रानी मसूरी में पेड़ों के कटान और तेजी से बढ़ते निर्माण के बीच अब प्लिंथ सर्टिफिकेट को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहे हैं। किसी भवन का प्लिंथ क्या होता है, उसका प्रमाणपत्र किस बात की पुष्टि करता है, इसे जारी करने का अधिकार किस विभाग या संस्था के पास है और इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया तथा शुल्क क्या हैं? इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी का अभाव आम नागरिकों और निर्माण से जुड़े लोगों के बीच असमंजस पैदा कर रहा है।
स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों ने प्लिंथ सर्टिफिकेट प्राप्त करने की प्रक्रिया और उससे जुड़े खर्च को लेकर चिंता जताई है। ऐसे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि निर्धारित आधिकारिक शुल्क कितना है, आवेदन से प्रमाणपत्र जारी होने तक कितने चरण हैं और प्रत्येक भुगतान की रसीद दी जाती है या नहीं। यह पड़ताल किसी एक संपत्ति या व्यक्ति से जुड़ी नहीं, बल्कि मसूरी में प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था, उसके कानूनी आधार और पारदर्शिता से संबंधित है।
प्लिंथ क्या है और प्रमाणपत्र किस बात का होता है?
निर्माण की सामान्य प्रक्रिया में प्लिंथ भवन का वह उठा हुआ आधार होता है, जो आसपास की जमीन के स्तर से ऊपर बनाया जाता है और जिस पर आगे दीवारों तथा भवन का निर्माण होता है। स्वीकृत भवन नक्शे के अनुसार निर्माण प्लिंथ स्तर तक पहुंचने पर संबंधित नियमों और प्रक्रिया के तहत उसका निरीक्षण या सत्यापन किया जा सकता है। इस चरण से संबंधित दस्तावेज को सामान्यतः प्लिंथ लेवल सर्टिफिकेट कहा जाता है।
हालांकि, स्वीकृत नक्शे के अनुसार नए निर्माण के प्लिंथ स्तर तक पहुंचने का प्रमाण और किसी भूखंड पर पहले से पुराने भवन या प्लिंथ के अस्तित्व का प्रमाण दो अलग-अलग विषय हो सकते हैं। इसलिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि मसूरी में जारी किए जा रहे दस्तावेज का आधिकारिक नाम क्या है और वह वास्तव में किस तथ्य की पुष्टि करता है।
क्या नगर पालिका नए निर्माण के प्लिंथ स्तर का प्रमाणपत्र और पुराने निर्माण के अस्तित्व से संबंधित कोई अलग प्रमाणपत्र जारी करती है? यदि ऐसा है, तो दोनों के आधिकारिक नाम, उद्देश्य, कानूनी आधार, निर्धारित प्रारूप और उन्हें जारी करने की प्रक्रिया क्या है? पुराने निर्माण के अस्तित्व की पुष्टि करने वाला कोई अलग दस्तावेज जारी किया जाता है, तो उसके लिए सक्षम अधिकारी को अधिकार किस शासनादेश या नियम के तहत प्राप्त है?
कौन जारी करता है और प्रक्रिया क्या है?
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि मसूरी में प्लिंथ सर्टिफिकेट जारी करने के लिए अधिकृत संस्था कौन है। क्या यह अधिकार नगर पालिका के पास है, MDDA के पास है या किसी अन्य विभाग अथवा सक्षम अधिकारी के पास? प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी की जिम्मेदारी और अधिकार क्या हैं? क्या इसके लिए कोई शासनादेश, विभागीय नियम, निर्धारित आवेदन प्रारूप और आवश्यक दस्तावेजों की सूची उपलब्ध है?
अब तक मसूरी में कितने प्लिंथ प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं? पूर्व नगर पालिका बोर्ड के कार्यकाल में कितने प्रमाणपत्र जारी हुए और उसके बाद कितने आवेदन प्राप्त हुए? इनमें कितने स्वीकृत, अस्वीकृत या लंबित हैं? क्या प्रमाणपत्र जारी करने से पहले स्थल निरीक्षण किया जाता है? क्या भवन की जोखिम श्रेणी के अनुसार स्व-प्रमाणन, अभिलेखीय सत्यापन या भौतिक निरीक्षण की अलग-अलग व्यवस्था लागू है? यदि भौतिक निरीक्षण आवश्यक है, तो निरीक्षण कौन करता है, उसकी रिपोर्ट कैसे तैयार होती है और क्या मौके की तस्वीरें, स्थान का विवरण तथा अन्य संबंधित दस्तावेज सरकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित रखे जाते हैं?
प्रमाणपत्र की फीस और अतिरिक्त खर्च को लेकर चिंता
प्लिंथ सर्टिफिकेट हासिल करने की प्रक्रिया और उससे जुड़े खर्च को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चिंताएं सामने आई हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यह प्रमाणपत्र प्राप्त करने में काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। ऐसे में नगर पालिका को निर्धारित आधिकारिक शुल्क और भुगतान प्रक्रिया सार्वजनिक करनी चाहिए।
इसके लिए शुल्क किस आदेश के तहत तय किया गया है? क्या आवेदन, स्थल निरीक्षण और प्रमाणपत्र जारी करने के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित हैं? भुगतान नकद, ऑनलाइन या किसी अन्य माध्यम से लिया जाता है? क्या प्रत्येक भुगतान की आधिकारिक रसीद दी जाती है? आवेदन जमा करने से प्रमाणपत्र मिलने तक की निर्धारित समय-सीमा क्या है?
यदि निर्धारित शुल्क से अधिक राशि मांगे जाने अथवा बिना आधिकारिक रसीद भुगतान लिए जाने की कोई शिकायत प्राप्त होती है, तो उसकी जांच और शिकायत निवारण की व्यवस्था क्या है? आधिकारिक शुल्क सूची, भुगतान प्रक्रिया और समय-सीमा सार्वजनिक होने से आवेदकों को असमंजस तथा अनधिकृत बिचौलियों पर निर्भरता से बचाने में मदद मिल सकती है।
नए निर्माण, पुराने भवन और खाली भूखंडों का सत्यापन कैसे होता है?
प्लिंथ सर्टिफिकेट की प्रक्रिया को समझने के लिए तीन अलग-अलग परिस्थितियों में लागू मानकों को स्पष्ट करना जरूरी है।
पहली स्थिति नए निर्माण की है, जहां किसी भूखंड पर स्वीकृत नक्शे के अनुसार नया भवन बनाया जा रहा है। ऐसे मामले में प्लिंथ स्तर तक निर्माण पहुंचने पर सत्यापन किस आधार पर होता है? क्या स्वीकृत नक्शे और मौके पर किए गए निर्माण का मिलान किया जाता है? क्या निरीक्षण रिपोर्ट तैयार होती है और उसके आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया जाता है? यदि कुछ श्रेणियों में स्व-प्रमाणन या अलग निरीक्षण व्यवस्था लागू है, तो उसके नियम क्या हैं?
दूसरी स्थिति ऐसे पुराने भवनों की है, जहां पहले निर्माण मौजूद था, लेकिन समय के साथ भवन नष्ट हो गया या केवल उसकी नींव अथवा प्लिंथ के अवशेष बचे हैं। ऐसे मामलों में पुराने निर्माण के अस्तित्व की पुष्टि किन दस्तावेजों से की जाती है? क्या पुराने भवन नक्शे, नगर पालिका के रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, हाउस टैक्स रिकॉर्ड, ऐतिहासिक तस्वीरें या अन्य उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की जाती है? क्या प्रस्तुत दस्तावेजों की तारीख, प्रामाणिकता और संबंधित भूखंड से उनका वास्तविक संबंध भी स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाता है? क्या केवल मौके पर मौजूद पत्थर या कंक्रीट की संरचना को पुराने भवन का पर्याप्त प्रमाण माना जाता है?
तीसरी स्थिति उन भूखंडों की है, जहां पहले कोई भवन या निर्माण मौजूद नहीं था और जमीन पेड़ों तथा प्राकृतिक वनस्पति से ढकी हुई थी। यदि ऐसे भूखंड पर बाद में पेड़ हटाए जाते हैं और नई प्लिंथ जैसी संरचना बनाई जाती है, तो क्या उसे पुराने निर्माण के अस्तित्व का प्रमाण बताया जा सकता है? यदि ऐसा दावा किया जाता है, तो उसकी ऐतिहासिक पुष्टि किस आधार पर होगी? क्या पुराने सैटेलाइट चित्रों, राजस्व नक्शों, भूमि अभिलेखों, पुराने भवन नक्शों और अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड से यह जांच की जाती है कि वहां वास्तव में पहले कोई भवन मौजूद था या नहीं?
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी भूखंड पर वर्तमान में प्लिंथ जैसी संरचना मौजूद होना अपने आप में इस बात का पर्याप्त प्रमाण नहीं है कि वहां पहले भी भवन था। खेत की मेड़, पहाड़ी को रोकने वाली रिटेनिंग वॉल या नई बनाई गई पत्थर-कंक्रीट की संरचना भी अपने आप में पुराने भवन की प्लिंथ साबित नहीं होती। पुराने निर्माण के दावे की पुष्टि के लिए उसकी पूर्व स्थिति और समय से संबंधित स्वतंत्र अभिलेखों का सत्यापन आवश्यक है।
पेड़ों के कटान और प्लिंथ प्रमाणपत्रों के बीच संबंध की जांच जरूरी
मसूरी में पेड़ों के कटान को लेकर उठती शिकायतों के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जिन भूखंडों पर पहले पेड़ और प्राकृतिक वनस्पति मौजूद थी, वहां निर्माण की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ रही है। यदि किसी स्थान पर पेड़ हटाए जाने के बाद नई प्लिंथ बनाई जाती है, तो क्या संबंधित विभाग यह जांचते हैं कि वहां पहले कोई भवन मौजूद था या यह पूरी तरह नया निर्माण है?
वन विभाग की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। संबंधित भूमि की कानूनी श्रेणी क्या है और क्या वह निजी भूमि, अधिसूचित वन क्षेत्र या किसी अन्य श्रेणी में आती है? जहां नियमानुसार आवश्यक हो, वहां पेड़ कटान की अनुमति और वन विभाग की NOC किस प्रक्रिया से प्राप्त की जाती है? क्या मौके का निरीक्षण होता है और क्या पेड़ों की स्थिति तथा भूमि के स्वरूप से संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाता है?
नगर पालिका से यह भी स्पष्ट किए जाने की जरूरत है कि पुराने निर्माण के अस्तित्व से संबंधित किसी प्रमाणपत्र को जारी करने से पहले वन विभाग या राजस्व विभाग के रिकॉर्ड का मिलान किया जाता है या नहीं। वहीं MDDA को बताना चाहिए कि भवन नक्शे की मंजूरी के दौरान नगर पालिका से प्राप्त ऐसे दस्तावेजों को किस रूप में स्वीकार किया जाता है और उनकी स्वतंत्र पुष्टि की क्या व्यवस्था है।
रिकॉर्ड सार्वजनिक हों और प्रक्रिया स्पष्ट हो
नगर पालिका को प्लिंथ सर्टिफिकेट जारी करने से संबंधित बुनियादी जानकारियां सार्वजनिक करनी चाहिए। इनमें प्रमाणपत्र का आधिकारिक नाम, कानूनी आधार, संबंधित शासनादेश, निर्धारित शुल्क, आवेदन प्रारूप, आवश्यक दस्तावेज, निरीक्षण की प्रक्रिया, समय-सीमा और अधिकृत अधिकारी का विवरण शामिल होना चाहिए। इसके साथ ही अब तक जारी प्रमाणपत्रों की वर्षवार संख्या और उनसे संबंधित उपलब्ध निरीक्षण रिकॉर्ड की जानकारी भी सामने आनी चाहिए।
नागरिक सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत मसूरी नगर पालिका से प्रमाणपत्र जारी करने के नियम, शासनादेश, शुल्क सूची, आवेदन प्रारूप, निरीक्षण प्रक्रिया, वर्षवार आंकड़े, प्रमाणपत्रों के रजिस्टर, निरीक्षण रिपोर्ट, उपलब्ध तस्वीरें और संबंधित फाइल नोटिंग की प्रमाणित प्रतियां मांगी जा सकती हैं।
MDDA से यह जानकारी मांगी जा सकती है कि पुराने भवन या प्लिंथ के अस्तित्व के प्रमाण के रूप में कौन-से दस्तावेज स्वीकार किए जाते हैं और नक्शा स्वीकृति के दौरान उनका सत्यापन किस प्रकार किया जाता है। वन विभाग से संबंधित भूखंडों पर जारी NOC, पेड़ कटान की अनुमति, निरीक्षण रिपोर्ट और कार्रवाई से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड मांगे जा सकते हैं।
इसके लिए संबंधित विभागों के लोक सूचना अधिकारियों को अलग-अलग आवेदन देना उपयोगी होगा। RTI में अधिकारियों से राय या स्पष्टीकरण मांगने के बजाय उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड, आदेश, रजिस्टर, फाइल नोटिंग और निरीक्षण रिपोर्ट मांगी जानी चाहिए। सामान्यतः सूचना देने की समय-सीमा 30 दिन है। जवाब न मिलने या अधूरी जानकारी मिलने पर नियमानुसार प्रथम अपील और उसके बाद उत्तराखंड सूचना आयोग में द्वितीय अपील की जा सकती है। तीसरे पक्ष की निजी जानकारी का प्रकटीकरण RTI अधिनियम के लागू अपवादों और प्रावधानों के अधीन होगा।
प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर नागरिक जिला प्रशासन, नगर पालिका, MDDA और वन विभाग को लिखित शिकायत देकर प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया, पुराने निर्माण के दावों, निरीक्षण और संबंधित अनुमतियों की जांच की मांग कर सकते हैं।
मसूरी में निर्माण और विकास जरूरी हैं, लेकिन किसी भी निर्माण की वैधता स्पष्ट नियमों, वास्तविक दस्तावेजों और उचित सत्यापन पर आधारित होनी चाहिए। प्लिंथ सर्टिफिकेट केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह किस बात की पुष्टि करता है, किस अधिकारी को उसे जारी करने का अधिकार है और उसके पीछे कौन-सा रिकॉर्ड मौजूद होना चाहिए।
आखिर मसूरी में प्लिंथ सर्टिफिकेट कौन जारी कर रहा है, किस कानूनी आधार पर, कितनी फीस लेकर और किस प्रक्रिया से? नए निर्माण, पुराने भवनों और उन भूखंडों के मामलों में, जहां पहले पेड़ और प्राकृतिक वनस्पति मौजूद थी, प्रमाणपत्र जारी करने के मानक क्या हैं? इन सवालों के स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब ही इस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं।


