*कुठौन्द के युवाओ के प्रेरणा श्रोत बने अरुण तिवारी*
“फर्श से तय किया अर्श तक का सफर”
कुठौन्द (जालौन ) बिजनेस में दो ही चीजें इंसान को कामयाब बनाती हैं, एक मेहनत और दूसरी नई सोच. ऐसी सोच जिसे या तो पहले किसी ने आजमाया ना हो या फिर उस पर इतनी शिद्दत से काम ना किया हो. बिजनेस के क्षेत्र में इन दो तरीकों का इस्तेमाल कर लोगों ने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है. आज की कहानी भी एक ऐसे ही शख्स की है, जिसने एक बड़े ही आम चलन को नया रूप दिया और खड़ा कर दिया हजारों करोड़ का स्कूल।
हम यहां बात कर रहे हैं अरुण तिवारी की जिन्होंने टीचिंग की दम पर कामयाबी की बुलंदियों को छू लिया.
जनपद जालौन के विकास खण्ड कुठौंद के एक छोटे से ग्राम मदनेपुर के निवासी अरुण तिवारी ने एक छोटी सी उम्र में बिना धन के अपनी महनत अच्छी सोच तथा अपने काम के प्रति लगन के दम पर सफलता का वो मुकाम हासिल किया है कि आज वो कुठौंद क्षेत्र में युवाओं के लिए प्रेरणा श्रोत बन गए है ।
अरुण तिवारी का जन्म एक किसान परिवार में 3फरवरी सन 1986 में जनपद जालौन के मद्नेपुर ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम रामकुमार तिवारी तथा माता का नाम सरोज तिवारी है। इनकी शिक्षा प्राइमरी तक गांव के ही प्राइमरी विद्यालय में हुई तथा जूनियर की पढ़ाई कस्वा कुठौंद के एक प्राइवेट विद्यालय बाल सैनिक से पूरी हुई। हाई स्कूल की शिक्षा ग्राम बावली के लहरी वावा इंटर कालेज से पूरी हुई इसके बाद इंटर मीडिएट की पढ़ाई कुठौंद के जनता सनातन धर्म इंटर कालेज से हुई। इसके बाद स्नातक की पढ़ाई तिलक डिग्री कालेज औरैया से पूरी की। घर में पैसे का अभाव था खेती से घर के खर्चे भी सही से नही चल पाते थे। इसलिए स्नातक के बाद पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग गया । लेकिन अरूण के अंदर हमेशा ही कुछ कर दिखाने का जुनून था ।बचपन से ही इमानदारी और समाजसेवा को प्राथमिकता देते हुए कुछ बड़ा करने की सोच के साथ फर्श से अर्श तक का सफर तय किया। कामयाबी हासिल करने के लिए पढ़ाई लिखाई बेहद जरूरी है, लेकिन अगर आपके अंदर सकारात्मक सोच और दूसरों का भला करने का इरादा नहीं है तो सारी पढ़ाई सभी किताबी ज्ञान व्यर्थ हैं। ऐसा मानना है अरूण का।
अब बताते है कि अर्श से फर्श तक सफर कैसे तय किया अरुण ने स्नातक करने के बाद अरुण ने अपने ही घर पर एक जय मां काली कोचिंग सेंटर के नाम से एक छोटा सा कोचिंग सेंटर खोला।जिसमें उन्होंने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया । कोचिंग से चार सौ पांच सौ रुपए कमा लेते थे उसी रुपए से ओरैया से इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स किया। उसके बाद घर घर बच्चों को होम ट्यूशन दिया करते थे । तीन महिने स्पीकिंग कोर्स करने के बाद कुठौंद में बच्चों को इंग्लिश स्पीकिंग पढ़ानी सुरु कर दी। इसके बाद अरुण ने अपने गुरू डॉक्टर गौरव वर्मा के सलाह पर एक छोटे से किराए के घर में पी जी से कक्षा प्रथम तक स्कूल की शुरुआत की । स्कूल को खोलने के लिए अरुण के पास रुपए नही थे । स्कूल को खुलवाने में अरुण के गुरू गौरव वर्मा ने तथा जिस घर में स्कूल खोला गया था उस मकान की मकान मालकिन आशा दुवे ने जो की रिश्ते में अरुण की बुआ लगती थी इन दोनो लोगो ने पैसे से अरुण की मदद की इन दोनो लोगो के मदद तथा आशीर्वाद से स्कूल खोला गया । उस स्कूल का नाम विजन इंटरनेशनल स्कूल रखा। दो वर्ष स्कूल किराए की जगह पर रहा ।दो साल बाद स्कूल को अरुण ने अपने खुद के खेत में बनवाया।
ईमानदारी और लगन से खड़ा किया इतना बड़ा साम्राज्य
अरुण बताते हैं कि उनके जीवन में ईमानदारी और लगन ने उन्हें आज इतने बड़े मुकाम पर लाकर खड़ा किया है। तथा आज उन्हें खुशी होती है की उनके द्वारा बनाए गए स्कूल से लगभग 30 परिवार चल रहे है । अरुण ने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा खुशी उस दिन हुई थी जिस दिन उन्होंने स्कूल में पहले महीने में स्कूल में काम करने वाले लोगो को सैलरी बांटी थी उस दिन बहुत खुशी हुई थी क्योंकि अरुण का कहना है की जितना वो घर घर ट्यूशन जाकर पूरे साल में कमाते थे उस दिन उन्होंने एक महिने में बांटा था।