संवाददाता नरेश सोनी
हजारीबाग लोकसभा के पूर्व सांसद यशवंत सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा जम्मू-कश्मीर के चुनाव के संदर्भ में पाकिस्तान के दिए गए बयान को मुद्दा बनाने पर कड़ा प्रतिरोध व्यक्त किया है। सिन्हा ने कहा, “मुझे जिस बात का डर था, वही हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू-कश्मीर के चुनाव में आखिरकार पाकिस्तान को मुद्दा बनाने का प्रयास किया है।”
यशवंत सिन्हा ने #पाकिस्तान को एक ‘फेल स्टेट’ (विफल राज्य) करार देते हुए कहा, “वह दूर-दूर तक भारत की बराबरी नहीं कर सकता है। यहां तक की अब हॉकी के खेल में भी वह भारत से लगातार हारता आ रहा है। अगर फेल स्टेट के रक्षा मंत्री ने कोई अटपटा बयान धारा 370 को लेकर दे भी दिया, तो क्या भारत के ‘यशस्वी’ प्रधानमंत्री को इस पर अपनी प्रतिक्रिया देना आवश्यक था? क्या विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस काम को नहीं कर सकते थे?”
यशवंत सिन्हा ने आरोप लगाया कि #प्रधानमंत्रीमोदी चुनाव में जीत हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया है। “#भाजपा की राजनीति अब केवल सांप्रदायिकता भड़काने तक सीमित रह गई है। अगर कभी मोदी जी को लगता है कि यह अपर्याप्त है, तो उसमें पाकिस्तान का तड़का लगाने का काम करते हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया है। पाकिस्तान के एक अदना से मंत्री के बयान को महत्व देकर देश के साथ नाइंसाफी किया है।”
उक्त जानकारी #अटलविचारमंच के मीडिया प्रभारी अनिल सिन्हा ने दी। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पाकिस्तान के बयान को चुनावी मुद्दा बनाने से केवल वोट बैंक की राजनीति को बल मिलता है और देश की वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकता है। “यह न केवल अनैतिक है, बल्कि देश के नागरिकों के साथ अन्याय भी है,” अनिल सिन्हा ने कहा।
यशवंत सिन्हा के इस बयान से राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। भाजपा ने इसे विपक्ष की हताशा और निराधार आरोप बताया है। वहीं, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सिन्हा के बयान का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों पर सवाल उठाए हैं।
इस विवाद के बीच, जम्मू कश्मीर में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। वहीं, आम जनता इस पूरे मुद्दे पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दे रही है। कुछ लोग इसे राजनीतिक स्टंट मानते हैं, तो कुछ इसे देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जोड़कर देख रहे हैं।
अंततः, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे का चुनावी नतीजों पर क्या प्रभाव पड़ता है और राजनीतिक दलों की रणनीति किस दिशा में जाती है।