मिलन सिंह यादव
पत्रकारिता दिवस पर विशेष संदेश मेरी कलम से????️
देश के तीन स्तंभ ही मजबूत थे तो क्यों जरूरत पड़ी चौथे स्तंभ कि?
क्या हम उस परिकल्पना को साकार कर रहे हैं? अंतरात्मा में झांके !
पत्रकारिता के दस्तावेज में जन्म के उल्लेख कि बात करें तो इसवी सन 131 को रोम में हुआ था । और भारत में कागजों में पत्रकारिता का जन्म सन 1776 में एक अंग्रेजी अख़बार से हुआ इसके प्रकाशक ईस्ट इंडिया कंपनी के भूतपूर्व अधिकारी विलेम बॉल्ट्स थे। यह अख़बार कंपनी व सरकार के समाचार प्रकाशित करता था। सब से पहला अख़बार, जिसमें विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त किये गये, वह 1780 में जेम्स ओगस्टस हीकी का अख़बार ‘बंगाल गज़ेट’ था। अख़बार में दो पन्ने थे और इस में ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत जीवन पर लेख छपते थे। जब हीकी ने अपने अख़बार में गवर्नर की पत्नी का आक्षेप किया तो उसे 4 महीने के लिये जेल भेजा गया और 500 रुपये का जुरमाना लगा दिया गया। बात अगर देश कि है तो इस भारत भूमि पर करोड़ों वर्ष पहले से देवर्षि नारद देवताओं और मनुष्यों के बीच के संवाद वाहक थे। आज हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जा रहा है । हिंदी पत्रकारिता को पूरे 195 साल हो गए हैं। 30 मई 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ का प्रकाशन आरम्भ किया था, तब से लेकर आज तक हिंदी पत्रकारिता देश मे एक अलग मुकाम हासिल कर चुकी है।
मुख्य मुद्दा यह है कि अंग्रेजों कि गुलामी से देश को आजादी दिलाने के मामले में पत्रकारिता कि अहम भूमिका रही। उस समय चोरी छुपे संदेश वाहक आजादी का बिगुल बजाने के लिए जोश फूंकने का कार्य करते थे । देश आजाद हुआ तो पत्रकारिता ने अपना एक अलग मुकाम हासिल किया। अंतिम पंक्ति के गरीब व्यक्ति कि आवाज, शोषितों पीड़ितों कि आवाज सरकार तक पहुंचाने का कार्य पत्रकारिता ने किया । संविधान में भले ही पत्रकारिता के लिए जगह नही मिल पायी लेकिन आज भी पत्रकारिता देश के लिए अपना अहम योगदान रखती है ।
देश में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका,न्यायपालिका के अलावा पत्रकारिता को चोथा स्तंभ माना जाने लगा , लेकिन क्या हम उस परिकल्पना को साकार कर पा रहे है। आज देश के गाँव गाँव में पत्रकारिता पहुँच गयी है । हर छोटे से छोटे जिले में न्यूनतम 200 से 500 तक पत्रकार है । देश भर कि बात करें तो जनसंख्या के आंकड़े का लगभग एक प्रतिशत पत्रकार हो चूका है । बावजूद उसके देश के प्रति हमारा योगदान क्या होना चाहिए इसे हम भूल चुके है । देश के तीन स्तंभ मजबूत है लेकिन इन तीनो स्तंभ को आईना दिखाना,अंकुश लगाना और सच्चाई से अवगत करवाकर देश कि प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना ही पत्रकारिता है । परन्तु क्या हम आज यह कर पा रहे है । अपनी अंतरात्मा में झाँक कर देखें तो देश भर में चन्द लोग ही ऐसे पत्रकार होंगे जिन्हें स्वहित से पहले देश से सरोकार हो।हो सकता है कुछ पत्रकारों को मेरी उक्त बात से नाराजगी हो परन्तु सच्चाई यही है।आजादी के पूर्व से लेकर 1990 के दशक तक लोग जिस पत्रकारिता के पेशे को आदर से देखते थे। पत्रकार को सम्मान की नजर से देखते थे उसी पत्रकारिता को 21 वीं सदी के प्रथम चरण में ही जनमानस घृणा की दृष्टि से क्यों देखने लग गए। एक जमाना था जब चौथी पांचवी पढ़े लिखे लोग भी पत्रकारिता के पेशे में आदर सम्मान से नवाजे जाते थे। लेकिन आज के दौर में किसी विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म की डिग्री लेकर बने पत्रकार को भी हिकारत की दृष्टि से देखा जा रहा है। आखिर क्या वजह रही? अगर पत्रकारिता को पुनर्जीवन प्रदान करना है तो हमे अब जागृत होना होगा। पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों को समझना होगा। सिर्फ विभिन्न विषयों जैसे कि सूचना, शिक्षा, मनोरंजन, वाचडाग पत्रकारिता, एडवोकेसी पत्रकारिता, पीत पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, राजनीतिक पत्रकारिता से ऊपर उठकर पुनः लोकतंत्र के रक्षक बनकर एजेडा निर्धारण करना होगा और पत्रकारिता के सिद्धांत अपनाकर यथार्थता, वस्तुपरकता, निष्पक्षता के संतुलन को अपनाना होगा, तब कहीं हम पुनः पत्रकारिता के मूल मार्ग पर लौट सकेंगे।
हमें अगर पत्रकारिता करना है, तो इससे भी अलग हटकर हमारी पहचान पुनः स्थापित करना होगी।
अब एक ही विकल्प है जिनको घर गृहस्ती चलाने के लिए रोजगार के रूप में पत्रकारिता करना हो वो या तो छोड़ दे या अपनी कलम इतनी पैनी कर ले कि आपका नाम सुनते ही आम नागरिक के मन मे आदर का भाव उत्पन्न हो। और उस आदर के रूप में मिले सहयोग से विज्ञापन आपकी रोजी रोटी बन सकती है। लेकिन यह ब्लैकमेलिंग कब तक करोगे? कलम को हथियार बनाकर की जा रही ब्लेकमेलिंग से पत्रकारिता विलुप्तता की कगार पर पहुंच गई है।
इसलिएअगर कोई नकली खाद्य सामग्री बेचकर केंसर फैला रहा है? कोई नकली प्रेस्टिसाईड बनाकर किसान को लूट रहा है? कोई अवैध खनन करके चूना लगा रहा है। तो इसको जरूर प्रसारित करो नही तो यह नासूर एक दिन केंसर बनकर उभरेगा। अन्यथा आपके कुछ रुपए ऐंठने पर वह नासूर जल्दी ही बड़ा घाव भी बन सकता है। ओर जरा यह भी सोचें कि उस बेईमान की वजह से समाज मे केंसर तो फेल ही रहा है लेकिन आपने संरक्षण देकर एक अपराधी को और ज्यादा बढ़ावा दे दिया है।
तो मित्रगणों हमे अब हमारी मूलधारा में लौटना होगा और पत्रकारिता के असल सिधान्तो पर चलना पड़ेगा।
इन्हीं शब्दों के साथ आपका अपना
????️मिलन सिंह यादव इंडियन टीवी न्यूज़ स्टेट हेड मध्य प्रदेश????️