✍ किशोर कुमार दुर्ग छत्तीसगढ़ ब्यूरो चीफ इंडियन टीवी न्यूज नेशनल
छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य तंत्र “वेंटिलेटर पर” है
छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था वर्तमान में गहरी संकट की स्थिति में है, जहां अधिकांश जिलों के अस्पताल गंभीर बीमारियों का इलाज करने में अक्षम हैं और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र लगभग ठप पड़े हैं । प्रमुख कारणकर्मचारियों की भारी कमी
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट (2016–2022) के अनुसार, राज्य में कुल स्वास्थ्यकर्मियों की 34% कमी है, जबकि डॉक्टरों की कमी 33% है ।
डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:2492 है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक (1:1000) से दो गुना से अधिक और राष्ट्रीय औसत (1:1456) से भी खराब है ।सुविधाओं का स्तर गिरा
जिला अस्पतालों में नर्सों की 27%, पैरा-मेडिकल स्टाफ की 24% और विशेषज्ञ डॉक्टरों की 3% कमी दर्ज की गई है ।
ICU में एक नर्स के ऊपर औसतन 20 बेड होने से गंभीर मरीजों की स्थिति और बिगड़ जाती है ।
ग्रामीण क्षेत्रों में हालात बदतर
गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जैसे ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र बंद पड़े हैं, डॉक्टर और नर्स अनुपस्थित हैं, और मरीजों को 20–30 किमी दूर तक दवा के लिए भटकना पड़ रहा है ।
कुछ क्षेत्रों में वार्ड बॉय, चौकीदार या सफाईकर्मी तक इंजेक्शन लगाते या दवाइयाँ बांटते पाए गए ।भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितता
दवाई और उपकरणों की खरीद में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ पाई गईं — 23.98 करोड़ रुपए की दवाइयाँ ब्लैकलिस्ट कंपनियों से खरीदी गईं, वहीं 49.68 करोड़ के उपकरण बिना आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर के खरीदे गए, जो अब बेकार पड़े हैं ।
समग्र प्रभावअधिकांश जिला और उप-स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, हृदय रोग या न्यूरोलॉजिकल केसों में केवल रायपुर के कुछ निजी अस्पताल ही इलाज करने में सक्षम हैं, जबकि ग्रामीण व छोटे शहरों के मरीजों को राज्य से बाहर रेफर होना पड़ता है।
निष्कर्षछत्तीसगढ़ का हेल्थ सेक्टर मजबूत नीति, पर्याप्त डॉक्टरों की नियुक्ति, दवा आपूर्ति में पारदर्शिता और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के पुनर्गठन के बिना पुनर्जीवित नहीं हो सकता।
फिलहाल राज्य का सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र “वेंटिलेटर पर” है — जिसे तत्काल संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है