और बीच में पिसता किसान
आज धोरीमन्ना और गुङामालानी को बाड़मेर से अलग कर बालोतरा में शामिल करने को “विकास” का नाम दिया जा रहा है।
लेकिन जब इस तथाकथित विकास की परतें खोली जाती हैं, तो नीचे कुतर्क, भ्रम और सत्ता का स्वार्थ ही नजर आता है—किसान कहीं नहीं।
1. कुतर्क: रिफाइनरी से रोजगार मिलेगा
वास्तविकता : गुङामालानी मे
RGT को आए वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब दे—


कितने खेतिहर परिवारों का जीवन वास्तव में बदला
सच यह है कि रिफाइनरी में रोजगार के लिए जिला तो क्या, देश भी बाधा नहीं—विदेशी कंपनियां भी और बाहरी लोग ही प्राथमिकता में हैं।
आज भी किसान आम बोलचाल में इसे “गोरो की कंपनी” कह रहे है।
किसान आज भी
दिहाड़ी,
पलायन,
और कर्ज़के बीच फंसा हुआ है।
2. कुतर्क: आवागमन की सुलभता
वास्तविकता :
कल तक बाड़मेर के लिए शुरू की गई एक बस का ढिंढोरा पीटा जा रहा था—तो क्या वह सब दिखावा था?
हकीकत यह है कि गुङामालानी से बाड़मेर के लिए
तीन मजबूत और विकसित सड़कें मौजूद हैं।अगर सच में नीयत विकास की होती तो
इन तीनों सड़कों पर रोडवेज बसें शुरू की जातीं
केवल गुङामालानी ही नहीं,
आडेल, नोखड़ा और मांगता के गांवों को भी सीधा लाभ मिलता
यह होता असल विकास।
लेकिन बालोतरा आवागमन की सच्चाई यह है कि—
आज भी किसान निजी ट्रैवल्स की लूट पर निर्भर है
यह सीधा किसान की जेब पर हमला है
और भविष्य में भी यही हाल रहने वाला है3. सबसे बड़ा सच: किसान पूरी तरह गायब
पिछले दो वर्षों में—
किसान का नाम तक नहीं लिया गया
अटके हुए आदान–अनुदान पर एक शब्द नहीं
बीमा क्लेम पर पूरी तरह चुप्पीविडंबना देखिए—
लोकसभा चुनाव में जिस तरह पूर्व कृषि मंत्री पर
“बीमा क्लेम खाने” का आरोप लगाकर उन्हें हराया गया,
आज वही लोग किसानों के बीमा क्लेम और अनुदान पर मौन साधे बैठे हैं।
सच कड़वा है, लेकिन जनता अब सब समझ चुकी है।
इतना ही नहीं—
जो लोग किसानों की आवाज उठा रहे हैं, किसानो की पैरवी कर रहे है-
उन्हीं का खुला विरोध किया जा रहा है
उन्हें दबाने के असफल प्रयास किए जा रहे हैं4. अतिक्रमण और सत्ता का दुरुपयोग
आज प्रशासन और सत्ता का पूरा ध्यान—
किसानों के धरनास्थल,कृषि विज्ञान केंद्र की जमीन सहित
अनेक सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण पर है
क्या बालोतरा में जाने से ये अतिक्रमण हट जाएंगे?
तमाम विभागों में ठेकों की बंदरबांट,जबकि धरातल पर काम कहीं नजर नहीं आता
क्या बालोतरा में यह बंदरबांट रुकेगी या और बढ़ेगी?
पावर सेंटर के दुरुपयोग पर आधारित व्यवस्था
क्या यह आमजन के हित में काम करेगीया आज की तरह और अधिक
अहंकार, दबाव और दमन थोपेगी?
किसानी के असली मुद्दे—
सिंचाई पानी
फसल सुरक्षा
बालोतरा के प्रदूषित पानी से बंजर होती जमीन
किसान का हक़— इन पर बात करने की किसी को फुर्सत नहीं।
धोरीमन्ना और गुङामालानी का यह पुनर्विन्यास
किसानों की जरूरत से नहीं,
बल्कि सत्ता के अहंकार और राजनीतिक स्वार्थ से तय किया जा रहा है।
जब तक—
किसान को केंद्र में नहीं रखा जाएगा
उसके बीमा, अनुदान और अतिक्रमण से राहत परईमानदारी से काम नहीं होगा
तब तक यह फैसला विकास नहीं, धोखा कहलाएगा।
किसान चुप है, कमजोर नहीं।
इतिहास गवाह है—
जब किसान बोलता है, तो नक्शे भी बदल देता है।
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