राजेश कुमार तिवारी इंडियन टीवी न्यूज़
कटनी।
वर्ष 2005 वो साल जिसे कटनी शहर आज भी भय और तबाही के रूप में याद करता है। आसमान से बरसी आफत और उफनाई कटनी नदी ने ऐसा रौद्र रूप दिखाया था कि पूरा शहर पानी-पानी हो गया था। नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया था कि घर, दुकानें, सड़कें और बस्तियां सब उसकी चपेट में आ गई थीं। लोगों की आंखों में डर था, सड़कों पर चीख-पुकार और चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी नजर आ रहा था।
कटनी नदी उस समय शहर के लिए किसी कहर से कम नहीं थी। नदी का तेज बहाव अपने साथ लोगों की उम्मीदें, सामान और वर्षों की मेहनत बहाकर ले गया था। प्रशासन से लेकर आम नागरिक तक हर कोई उस भयावह मंजर का गवाह बना था।
लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि कभी शहर को डुबो देने वाली यही कटनी नदी आज खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
जहां कभी पानी का तेज बहाव हुआ करता था, वहां अब सूखी धरती, गंदगी और अतिक्रमण नजर आता है। नदी की धारा सिकुड़ चुकी है और जलस्तर लगातार घटता जा रहा है। पर्यावरण की अनदेखी, अवैध कब्जे और लगातार बढ़ते प्रदूषण ने कटनी नदी को मौत के मुहाने पर पहुंचा दिया है।
एक समय था जब कटनी नदी शहर की पहचान हुआ करती थी, लेकिन आज वही नदी मदद और संरक्षण की गुहार लगा रही है। सवाल यह है कि क्या शहर अपनी इस जीवनदायिनी नदी को बचाने के लिए आगे आएगा, या फिर आने वाली पीढ़ियां सिर्फ तस्वीरों में ही कटनी नदी का इतिहास देखेंगी।