“₹4.93 करोड़ की सड़क, फिर भी धूल-कीचड़ से बेहाल जनता! ओबरा-डाला मार्ग पर PWD के ‘सतरंगी खेल’ का खुलासा
जिला ब्यूरो चीफ : शिशिर शर्मा (सोनभद्र )
ओबरा,सोनभद्र। वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग को जोड़ने वाले डाला से बिल्ली गजराज नगर संपर्क मार्ग की जमीनी हकीकत आज लोक निर्माण विभाग की लापरवाही की भेंट चढ़ता प्रतीत हो रहा है। सरकार ने ₹4 करोड़ 93 लाख की यह भारी-भरकम रकम इसलिए मंजूर की थी ताकि जनता को एक आसान, सुरक्षित और बेहतर सफर का अधिकार मिल सके। लेकिन ओबरा क्षेत्र में एक लंबे समय से कुर्सी पर पैर जमाए व अपनी कुर्सी को सुरक्षित कर बैठे जूनियर इंजीनियर जितेंद्र सिंह और उनके पसंदीदा ठेकेदार की मनमानी का आलम यह है कि दोनों ने मिलकर इस पूरे ₹4.93 करोड़ के प्रोजेक्ट को एक मज़ाक बनाकर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय स्तर पर लगातार सबूतों के साथ खबरें छपने और जनता द्वारा अनगिनत गंभीर शिकायतें किए जाने के बावजूद प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की चुप्पी संदेहात्मक परिस्थितियों उत्पन्न कर रही हैं। क्या प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की यह चुप्पी सीधे तौर पर इन लापरवाह लोगों से मिलीभगत को दर्शाती हैं। विभाग के इस अनोखे काम और तकनीकी नियमों को ताक पर रखने का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि निर्माण कार्य में ‘नियम और कानून’ जैसी चीजें पूरी तरह से समाप्त हो गई हैं। विभाग का तरीका देखिए—पहले नाली का काम थोड़ा सा आगे बढ़ाएंगे, फिर उसे वैसे ही आधा-अधूरा छोड़कर आगे भाग जाएंगे। फिर सड़क किनारे इंटरलॉकिंग के लिए गिट्टी-कंक्रीट डालेंगे, उसे भी बीच में छोड़कर कहीं और चले जाएंगे। सड़क का चौड़ीकरण तो और भी नायाब है; नियम-कानून को ताक पर रखकर, घर और व्यक्ति विशेष के रसूख और जान-पहचान को देखकर एक तरफ की चौड़ाई बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई है, जबकि दूसरी तरफ सड़क को दबाकर छोड़ दिया गया है। इस तरह की लापरवाही का नतीजा यह है कि इस पूरे मार्ग पर जगह-जगह टूटे, उबड़-खाबड़ रास्तों और मलबे का ऐसा जाल बिछ गया है, जिसके कारण जून 2026 की इस भीषण गर्मी में भी पूरा क्षेत्र धूल के घने और दमघोंटू कोहरे से ढका रहता है।
इस बदहाली का दर्द वो वीआईपी अधिकारी क्या समझेंगे, जो बंद गाड़ियों में घूमते हैं! असली मुसीबत तो उस गरीब और मध्यमवर्गीय समाज की है जो बाइक, ई-रिक्शा, टोटो, टेम्पो या पैदल इस नरक से गुजरने को मजबूर है। जब एक आम नागरिक घर से साफ-सुथरा, नहा-धोकर और अच्छे कपड़े पहनकर निकलता है, तो इस प्रदूषित माहौल में कदम रखते ही कुछ ही दूरी पर उसका पूरा शरीर और कपड़े धूल से सन जाते हैं। स्थानीय निवासियों के लिए यह धूल का बवंडर सीधे उनके फेफड़ों और आँखों पर वार कर रहा है, जिससे लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हद तो तब हो जाती है जब धूल से घबराकर लोग बारिश की उम्मीद करते हैं, और हल्की सी फुहार पड़ते ही यह आधा-अधूरा छूटा हुआ काम और सड़क पर बिखरा मलबा कीचड़ के जानलेवा दलदल और जलभराव के टापू में बदल जाता है। गाड़ियाँ आधे से ज्यादा पानी में डूब जाती हैं, जिससे मोटरसाइकिल और टोटो का पलटना और राहगीरों का चोटिल होकर अस्पताल पहुँचना एक आम बात बन चुकी है। जनता के बहते खून और लगातार हो रही इन दुर्घटनाओं के बाद भी जनसुनवाई (IGRS) पोर्टल पर शिकायतों के समाधान के नाम पर दफ्तर में बैठकर केवल झूठी रिपोर्ट लगा दी जाती है, जबकि धरातल पर काम पूरी तरह शून्य है।